मंगलवार, 29 नवंबर 2011

क्यों है मूँगफली एक पौष्टिक भोजन? Why peanut is nutritious?

क्यों है मूंगफली एक पौष्टिक भोजन? Why  peanut is nutritious?
'गरीबों का काजू' के नाम से मशहूर मूँगफली काजू से ज्य़ादा पौष्टिक है परन्तु मूँगफली खाने वाले यह नहीं जानते,मूँगफली में सभी पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं। मूँगफली खाकर हम अनजाने में ही इतने पोषक तत्व ग्रहण कर लेते हैं जिन का हमारे शरीर को बहुत फायदा होता है मूँगफली में प्रोटीन,वसा,शर्करा,विटामिन,खनिज,रुक्षांश प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं शोधों से ऐसा पता चला है कि मूँगफली में कैल्शियम और विटामिन डी अधिक मात्रा में होता है मूँगफली में प्रोटीन की मात्रा 25 प्रतिशत से भी अधिक होती हैमूंगफली में विटामिन ई का भंडारण होता है

आधे मुट्ठी मूगफली में 426 कैलोरीज़ होती हैं, 15 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है, 17 ग्राम प्रोटीन होता है और 35 ग्राम वसा होती है। इसमें विटामिन ई, के और बी6 भी प्रचूर मात्रा में होती है। यह आयरन, नियासिन, फोलेट, कैल्शियम और जि़ंक का अच्छा स्रोत हैं।

तुलनात्मक दृष्टि से मूँगफली का अध्ययन निम्न है,
इसमें प्रोटीन की मात्रा मांस की तुलना में 1.3 गुना, अण्डो से 2.5 गुना एवं फलो से 8 गुना अधिक होती हैं।
100 ग्राम कच्ची मूँगफली में 1 लीटर दूध के बराबर प्रोटीन होता है । 
250 ग्राम भूनी मूँगफली में जितनी मात्रा में खनिज और विटामिन पाए जाते हैं, वो 250 ग्राम मांस से भी प्राप्त नहीं हो सकता है।
250 ग्राम मूँगफली के मक्खन से 300 ग्राम पनीर, 2 लीटर दूध या 15 अंडों के बराबर ऊर्जा की प्राप्ति आसानी से की जा सकती है।
एक अंडे के मूल्य के बराबर मूँगफलियों में जितनी प्रोटीन व ऊष्मा होती है, उतनी दूध व अंडे से संयुक्त रूप में भी नहीं होती।

मूँगफली  के लाभ :

पौष्टिकता से भरपूर मूँगफली में कैंसर प्रतिरोधी तथा कॉलेस्ट्रॉल कम करने की क्षमता है।

इसका संबंध ह्रदय की बीमारियों को घटाने में भी महत्वपूर्ण है।

कच्ची मूँगफली रोज खाने से नवजातक माताओं के दूध में वृद्धि होती है।

यह पाचन शक्ति को बढ़ाती है।
मूँगफली या उससे निर्मित खाद्य सामग्री के उपयोग से रक्त स्त्राव की बीमारी में आराम मिलता है।

भुनी मूँगफली एण्टीआक्सिडेंट्स का अच्छा स्रोत है।

बिना नमक वाली मूँगफली में मोनोसैचुरेटेड वसा बहुत अधिक मात्रा में होती है और यह स्वस्थ धमनियों के लिए अच्छी होती है। धमनियों को स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो रक्त में कालेस्ट्रानल के स्तर को ठीक रखें।

मूँगफली  में विटामिन ई का भंडारण होता है और यह कैंसर और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा कम करती है।
मूँगफली महिलाओं और पुरूषों में हार्मोन्स के विकास के लिए भी अच्छी  होती है।
शोधों से ऐसा पता चला है कि मूँगफली में कैल्शियम और विटामिन डी अधिक मात्रा में होता है और यह दांतों के स्वास्‍थ्‍य के लिए भी अच्छा होता है।
मूँगफली के बारे में ओर रोचक बाते :

मूँगफली एक अखरोट यानि की नट नहीं है लेकिन एक फली नस्ल से संबंधित जरूर है 
फाइटोस्टेरॉल (phytosterols)
मूँगफली में किसी भी अन्य नट की तुलना में अधिक प्रोटीन, नियासिन, फोलेट और फाइटोस्टेरॉल (phytosterols) पादपरसायन होता है
मूँगफली में अंगूर,अंगूर का रस, हरी चाय, टमाटर, पालक, ब्रोकोली, गाजर से अधिक उच्च एंटीऑक्सीडेंट क्षमता है
मूँगफली  चार प्रकार की होती हैं -रनर, वर्जीनिया, स्पेनिश, और वालेंसिया

मूँगफली  सितंबर और अक्टूबर में नयी आ जाती है

फसल रोपण विधि से लगाई जाती है मूँगफली का विकास चक्र 120 से 160 दिन या पाँच महीने होता है


मूँगफली का मक्खन 
मूँगफली और मूँगफली का मक्खन 30 में अधिक आवश्यक पोषक तत्वों और फाइटोन्युट्रीयेंट्स   phytonutrients होते हैं
मूँगफली स्वाभाविक रूप से कोलेस्ट्रॉल मुक्त हैं
मूँगफली का पौधा मूल रूप से दक्षिण अमेरिका में जन्मा है मूँगफली का पौधा छोटे छोटे पीले फूल पैदा करता है
एक परिपक्व मूँगफली का पौधे में 40 फली (Pods) होती है यानी एक पोधा 40 मूँगफली पैदा करता है
नियासिन (Niacin) एक महत्वपूर्ण विटामिन बी  है जोकि  भोजन को ऊर्जा में परिवर्तित करने में मदद करता है मूँगफली नियासिन का एक बहुत अच्छा स्रोत माना जाता  है
फोलेट (Folate) 
फोलेट (Folate) कोशिका विभाजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जिसका अर्थ है कि पर्याप्त फोलेट का सेवन गर्भावस्था और बचपन के दौरान जब ऊतक तेजी से बढ़ रहे हैं तब विशेष रूप से महत्वपूर्ण है मूँगफली फोलेट का एक अच्छा स्रोत  है
 एंटीऑक्सिडेंट के रूप में मूँगफली .....
विटामिन ई एक बेहतरीन आहार एंटीऑक्सिडेंट होता है कि आक्सिजनित तनाव,  हानिकारक शारीरिक प्रक्रिया से कोशिकाओं की रक्षा में मदद करता  है
मूँगफली विटामिन ई  का एक अच्छा स्रोत  है

रेशा फाइबर का पाचन तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान  है. मूँगफली फाइबर का एक अच्छा स्रोत है

मोनोअनसेचुरेटेड और पॉलीअनसेचुरेटेड दोनों प्रकार की वसा एक स्वस्थ आहार के लिए योगदान स्वरूप है मूँगफली  और मूँगफली के मक्खन के एक बार के आहार में 4.5 ग्राम पॉलीअनसेचुरेटेड वसा और 8 ग्राम मोनोअनसेचुरेटेड वसा शामिल होती है

मूँगफली शरीर में गर्मी पैदा करती है, इसलिए सर्दी के मौसम में ज्यादा लाभदायक है। यह खाँसी में उपयोगी है व मेदे और फेफड़े को बल देती है। 
भोजन के बाद यदि 50 या 100 ग्राम मूँगफली प्रतिदिन खाई जाए तो सेहत बनती है, भोजन पचता है, शरीर में खून की कमी पूरी होती है।
इसे भोजन के साथ सब्जी, खीर, खिचड़ी आदि में डालकर नित्य खाना चाहिए। मूँगफली में तेल का अंश होने से यह वायु की बीमारियों को भी नष्ट करती है। 
सर्दियों में त्वचा में सूखापन आ जाता है। जरा सा मूँगफली का तेल, दूध और गुलाब जल मिलाकर मालिश करें। बीस मिनट बाद स्नान कर लें। इससे त्वचा का सूखापन ठीक हो जाएगा 
मुट्ठीभर भुनी मूँगफलियाँ निश्चय ही पोषक तत्वों की दृष्टि से लाभकारी हैं। 
तो देखा कितने गुण हैं मूँगफली में .....
आओ इसे अपने आहार का एक मुख्य भाग बनाएँ और इस के बेहतरीन गुणों का लाभ उठायें    



रविवार, 25 सितंबर 2011

क्या होता है यूरिक अम्ल ? What is Uric Acid ?

क्या होता है यूरिक अम्ल ? What is Uric Acid ?

विषमचक्रीय ऐमिनो अम्ल
यूरिक एसिड : कार्बन,हाईड्रोजन,आक्सीजन और नाईट्रोजन तत्वों से बना यह योगिक जिस का अणुसूत्र C5H4N4O3.यह एक विषमचक्रीय योगिक है जो कि शरीर को प्रोटीन से एमिनोअम्ल के रूप मे प्राप्त होता है.
प्रोटीनों से प्राप्त ऐमिनो अम्लों को चार प्रमुख वर्गों में विभक्त किया गया है 
1. उदासीन ऐमिनो अम्ल 
2. अम्लीय ऐमिनो अम्ल 
3. क्षारीय ऐमिनो अम्ल 
4. विषमचक्रीय ऐमिनो अम्ल.
यह आयनों और लवण के रूप मे यूरेट और एसिड यूरेट जैसे अमोनियम एसिड यूरेट के रूप में शरीर मे उपलब्ध है.
प्रोटीन एमिनो एसिड के संयोजन से बना होता है। पाचन की प्रक्रिया के दौरान जब प्रोटीन टूटता है तो शरीर में यूरिक एसिड बनता है जब शरीर मे प्यूरीन न्यूक्लिओटाइडों टूट जाती है तब भी यूरिक एसिड बनता है.
प्युरीन क्रियात्मक समूह होने के कारण यूरिक अम्ल एरोमेटिक योगिक होते हैं.
शरीर मे यूरिक अम्ल का स्तर बढ़ जाने की स्तिथि को hyperuricemia कहते हैं. 
हम प्रोटीन कहाँ से प्राप्त करते है और प्रोटीन क्यों जरूरी हो शरीर के लिए ये जानना भी जरूरी हो जाता है अब ? 
मनुष्यों और अन्य जीव जंतुओं के लिए प्रोटीन बहुत जरूरी आहार है. इससे शरीर की नयी  कोशिकाएँ और नये ऊतक बनते हैं पुरानी कोशिकाओं और उत्तको की टूटफूट की मरम्मत के लिए प्रोटीन बहुत जरूरी आहार है.  प्रोटीन के अभाव से शरीर कमजोर हो जाता है और कईं रोगों से ग्रसित  होने की संभावना बढ़ जाती है। प्रोटीन शरीर को  ऊर्जा भी प्रदान करता है.
वृद्धिशील शिशुओं,बच्चो,किशोरों और गर्भवती स्त्रियों के लिए अतरिक्त प्रोटीन भोजन की मांग ज्यादा होती है परन्तु 25 वर्ष की आयु के बाद कम शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्तियों के लिए अधिक मात्रा मे प्रोटीन युक्त भोजन लेना उनके लिए यूरिक अम्लों की अधिकताजन्य दिक्कतों का खुला निमंत्रण साबित होते हैं.
रेड मीट(लाल रंग के मांस)सी फूड, रेड वाइन, दाल, राजमा, मशरूम, गोभी, टमाटर, पालक, मटर,पनीर,भिन्डी,अरबी,चावल आदि के अधिक मात्रा में सेवन से भी यूरिक एसिड बढ जाता है।
उच्च यूरिक एसिड के कारण : 
शरीर में यूरिक ऐसिड बढ़ने के कई कारण हो सकते हैं
>भोजन के रूप मे लिए जाने वाले प्रोटीन प्युरीन और साथ मे उच्च मात्रा मे शर्करा का लिया जाना रक्त मे यूरिक एसिड की मात्रा को बढाता है.
>कई लोगों मे वंशानुगत कारणों को भी यूरिक एसिड के ऊँचे स्तर के लिए जिम्मेवार माना गया है.
गुर्दे द्वारा सीरम यूरिक एसिड के कम उत्सर्जन के कारण  भी इसका स्तर रक्त मे बढ़ जाता है. 
>उपवास या तेजी से वजन घटाने की प्रक्रिया मे भी अस्थायी रूप से यूरिक एसिड का स्तर आश्चर्यजनक स्तर  तक वृद्धि कर जाता हैं.
>रक्त आयरन की अधिकता भी यूरेट स्तर को बढ़ाती है जिस पर आयरन त्याग यानी रक्तदान से नियंत्रण किया जा सकता है.
> पेशाब बढ़ाने वाली दवाएं या डायबटीज़ की दवाओं के प्रयोग से भी यूरिक ऐसिड बढ़ सकता है.
उच्च यूरिक एसिड के नुकसान :
>इसका सबसे बड़ा नुकसान है शरीर के छोटे जोड़ों मे दर्द जिसे गाउट रोग के नाम से जाना जाता है.
मान लो आप की उम्र 25 वर्ष से ज्यादा है और आप उच्च आहारी हैं रात को सो कर सुबह जागने पर आप महसूस करते है कि आप के पैर और हाथों की उँगलियों अंगूठों के जोड़ो मे हल्की हल्की चुभन जैसा दर्द है तो आप को यह नहीं मान लेना चाहिये कि यह कोई थकान का दर्द है आप का यूरिक एसिड स्तर बड़ा हुआ हो सकता है. तो अगर कभी आपके पैरों की उंगलियों, टखनों और घुटनों में दर्द हो तो इसे मामूली थकान की वजह से होने वाला दर्द समझ कर अनदेखा न करें यह आपके शरीर में यूरिक एसिड बढने का लक्षण हो सकता है. इस स्वास्थ्य समस्या को गाउट आर्थराइट्सि कहा जाता है.
>अगर व्यक्ति की किडनी भीतरी दीवारों की लाइनिंग क्षतिग्रस्त हो तो ऐसे में यूरिक एसिड बढने की वजह से किडनी में स्टोन भी बनने लगता है.
गाउट आर्थराइट्सि गठिया का एक रूप :
 स्रोत: health.howstuffworks.com
गाउट एक तरह का गठिया रोग ही होता है.
जिस के कारण शरीर के छोटे ज्वाईन्ट्स प्रभावित होते .हैं
विशेषकर पैरों के अंगूठे का जोड़ और उँगलियों के जोड़ व उँगलियों मे जकड़न रहती है.
हालाँकि इससे एड़ी, टख़ने, घुटने, उंगली, कलाई और कोहनी के जोड़ भी प्रभावित हो सकते हैं.
 इसमें बहुत दर्द होता है.
जोड़ पर सुर्ख़ी और सूजन आ जाती है और बुख़ार भी आ जाता है. 
यह शरीर में यूरिक ऐसिड के बढ़ने से पैदा होती है. 
(पेशियों में जमा यूरिक एसिड क्रिस्टल, मस्क्युलर रिह्यूमेटिज्म के रूप में सामने आता है, तो जोड़ों के बीच जमा एसिड क्रिस्टल आरथ्राइटिस के रूप में जोड़ों के बीच एसिड क्रिस्टल जमा होने से चलने-फिरने पर चुभने जैसा दर्द और टीस होती है जोड़ों में जकड़न आ सकती है.) 
यह बढ़ा हुआ यूरिक एसिड रक्त के साथ शरीर के अन्य स्थानों मे पहुँच जाता है.
खास तौर पर हड्डियों के संधि भागों मे जाकर रावों के रूप मे जमा होना  शुरू हो जता है.
यह  जन्म देती है साध्य रोग शरीर के छोटे जोड़ों मे दर्द गाउट Gout को. 
जोड़ो मे जमा यूरिक एसिड के क्रिस्टल 
अगर यूरिक ऐसिड बढ़ जाए तो वह बहुत नन्हें-नन्हे क्रिस्टलों के रूप में जमा हो जाता है.
हड्डियों मे ख़ासतौर से जोड़ों के आस पास. 
ये क्रिस्टल बहुत ही धारदार होते हैं. 
जो की जोड़ों की चिकनी झिल्ली में चुभते हैं. 
चुभन और भयंकर दर्द पैदा करते हैं.  
गाउट रोग के कारण जोड़ों को घुमाने या गति उत्पन्न करने में कठिनाई महसूस होती है.
ठंडी या शीत हवाओं के कारण पीड़ा बढ़ जाती है.
इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है की इसमें रात में दर्द बढ़ जाता है और सुबह शरीर अकड़ता है.

बढ़ी हुई यूरिक एसिड की मात्रा भविष्य मे कईं अन्य रोगों का कारण बनती है जैसे,
गुर्दे मे पथरी 
मधुमेह (डायबिटीज़)
कार्डियोवस्कुलर रोग
मेटाबोलिक सिंड्रोम
http://www.ehow.com/info_8070243_foods-remove-acid-system.html
बचाव :
>यह प्रयास करें कि अधिक से अधिक मात्रा में पानी पीया जाए, इससे रक्त में मौजूद अतिरिक्त यूरिक एसिड मूत्र  के द्वारा शरीर से बाहर निकल जाता है. 
यदि दर्द बहुत ज्यादा है तो दर्द वाले स्थान पर बर्फ को कपडे मे लपेट कर सिंकाई करने से फायदा होता है. 
 खान-पान की आदत बदलें शरीर में जमा अतिरिक्त यूरिक एसिड को उदासीन करने के लिए खानपान में क्षारीय    पदार्थों की मात्रा को बढ़ाना चाहिए। फलोंहरी सब्जियों, मूली का जूस, दूधबिना पॉलिश किए गए अनाज इत्यादि में अल्कली की मात्रा अधिक होती है 
हमें संतुलित आहार लेंना चाहिएकार्बोहइड्रेटप्रोटीन, वसाविटमिन और खनिज सब कुछ सीमित और संतुलित मात्रा में होना चाहिए.आम तौर पर शाकाहारी भोजन(दाल-चावलरोटीसब्जी) संतुलित होता है और उसमें ज्यादा फेर-बदल की जरूरत नहीं होती.
नियमित व्ययाम इस समस्या से बचने का सबसे आसान उपाय है क्योंकि इससे शरीर में अतिरिक्त प्रोटीन जमा नहीं हो पाता.
इस समस्या से ग्रस्त लोगों को नियमित रूप से दवाओं का सेवन करते हुएहर छह माह के अंतराल पर यूरिक एसिड की जांच करानी चाहिए. 
> शाकाहारी बने.
> पोटाशियम युक्त भोजन पर केला नहीं.
> काबू ना आने पर चिकित्सक के परामर्श से दवाईयां लेना ना भूलें. 
खीरे के हरे जूस को इसके निवारण का बेहतर उपाय माना गया है 
देखें यह लिंक 
http://fitlife.tv/how-to-remove-uric-acid-crystalization-in-joints-gout-and-joint-pain/ 

रविवार, 18 सितंबर 2011

क्या सच है वैश्विक शीतलन?What Is Global Cooling?

क्या सच है वैश्विक शीतलन ? What  Is  Global Cooling ?
u4mix.com
मानवीय क्रियाकलाप और क्या क्या दिन दिखाएँगे अभी यह अनुमान लगाना जरूरी है पिछले अनुभव बताते हैं कि जब जब बर्फ तेजी से पिंघली है उस के बाद ठण्ड अचानक बढ़ी है.
ग्लोबल वार्मिंग के दौरान बर्फ पिंघली है और उस के पिंघलने के बाद फिर ठंडक पैदा होगी तो वो स्तिथि ग्लोबल कूलिंग कहलाएगी.
हम उत्तर भारत की स्तिथि पर गौर करें तो गत वर्षों मे ठण्ड बढ़ी है लोगों को ये कहते सुना है कि इस बार जैसी ठण्ड तो जिंदगी मे पहली बार देखी है.
जब सं २००५ मे मुंबई मे अचानक बर्फबारी देखी तो लोग सकते मे आ गए, 
२००४ मे शिवालिक की निचली चोटियों,पर्वतों पर बर्फ बिछ गयी जिसने कि मौसमविदो को चौंका दिया, सन्  २००८ मे भारतीय कृषि शोध संस्थान पूसा के खेतों मे व गत वर्ष इंडिया गेट दिल्ली के पास बर्फ के कण गिरे देखे गए.
angryconservative.com
शोध बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिग के साईड इफेक्ट के रूप मे ग्लोबल कूलिंग भी पृथ्वी का दरवाजा खटखटा रही है.
आप ब्रिटेन में क्या हुआ यह देखो,दस साल पहले ब्रिटेन के लिए ग्लोबल वार्मिंग के संदर्भ में यह कहा गया था और कि अब ब्रिटेन मे बर्फ अतीत की बात होगी परन्तु इस सर्दी मे दिसंबर 2010 मेंलगभग एक महीने के लिए में पूरा ब्रिटेन कूलिंग के कारण अपंगता जैसी स्तिथि मे आ गया था.  
अगले 2-3 दशकों मे ही वैश्विक ठण्ड वैश्विक उष्मन की अपेक्षा अधिक हो जाएगी जो कि हानिकारक है ग्लोबल वार्मिंग की  तुलना में.
१९७० के दशक मे जब पहली बार ग्लोबल कूलिंग का जिक्र आया तो वैज्ञानिकों की मिश्रित सी प्रतिक्रिया थी परन्तु आज जब वैश्विक उष्मन के चरम को झेल चुकी पृथ्वी तप कर गर्म हो जानी चाहिए थी ऐसी स्तिथि मे वैश्विक शीतलन दस्तक दे रही है.
वैज्ञानिकों की रिपोर्ट्स के अनुसार माना जा रहा है कि पृथ्वी पर खड़ा दो तिहाई पानी कभी भी ठंडा हो कर बर्फ बनने की स्तिथि मे आ सकता है जब यदि दक्षणी ध्रुव की चोदह सो फीट मोटी बर्फ की परत यदि पिंघल जाती है तो हिंद महासागर मे २०० मीटर पानी उपर चढ़ जायेगा जिसके परिणाम स्वरूप पिंघली बर्फ की ठण्ड के कारण भीषण ग्लोबल कूलिंग का सामना करना पडेगा.
एयरोसोल्ज यानि जीवाश्म इंधनो के दहन से उत्पन्न छोटे कण की वातावरण में संख्या बढ़ जाती हैजो कि सौर विकिरण के तापीय घटक को वापिस अंतरिक्ष मे भेज देते हैं जिस कारण सौर उष्मा का मान कम हो जाता है जो कि वैश्विक शीतलन का सीधा सीधा संकेत है. 
http://climatechangedispatch.com
यहाँ तक की  नेल्सन मंडेला मेट्रोपोलिटन विश्वविद्यालय के एक सेवानिवृत्त भौतिकी के प्रोफेसर ग्लोबल वार्मिंग के सिद्धांत को अस्वीकार कर दिया है, उनका तर्क है कि वैश्विक तापमान वास्तव में ठण्ड की और अग्रसर है. उन्होंने कहा "राजनेता, ग्रीनपीस और मीडिया इन ग्लोबल वार्मिंग झूठ के लिए जिम्मेदार हैं." उन्होंने जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र के स्तर में एक खतरनाक वृद्धि की चेतावनी का मजाक उड़ाया है और साफ़ तौर पर कहा है कि जलवायु परिवर्तन के झूठ को इस तरह से लोगों के बीच वैध पर्यावरण चिंताओं के रूप मे  राजनीतिक और वित्तीय एजेंडे को आगे करने के लिए चालाकी से किया गया है जिसका सीधा सीधा नुकसान विकासशील देशों को होगा जो कि सब्सिडी प्राप्त कर रहे थे वो निकाल बाहर किये जायेंगे.
इस वक्तव्य से तो स्पष्ट होता है कि ग्लोबल वार्मिंग झूठ का सफ़ेद हाथी खड़ा किया गया है जबकि पृथ्वी और वैश्विक प्रवृत्ति शीतलन की है ना कि उष्मन की इतिहास इसका गवाह है पृथ्वी को कईं हिम युगों को झेलना पड़ा है . 
अब वैज्ञानिक चेतावनियों मे कितनी सच्चाई है यह तो भविष्य के गर्त मे छिपा है परन्तु एक बात सच है कि मानवीय प्रदूषणकारी क्रियाकलाप इस पृथ्वी पर एक और हिमयुग लाने की तैयारी पूरी कर चुके हैं.  

सोमवार, 1 अगस्त 2011

क्या होती है अतिचालकता ? What is Superconductivity ?

क्या होती है अतिचालकता ? What is Superconductivity
वैज्ञानिक निरंतर इस प्रयास मे हैं कि सामान्य प्रयोग मे भी ऐसी चालक तार बनायी जाए जिस का प्रतिरोध(तार के द्वारा अपने मे से हो कर जाने वाली विधुत को रोक कर ताप मे बदल देना इस से विधुत नष्ट होती है)  न्यूनतम या शून्य हो ऐसा हो जाने से विधुत के चालन के क्षेत्र  मे एक क्रान्ति आ जाएगी.
आओ अब जानते हैं ये क्या है ?
कुछ विशेष परिस्थितियों मे किसी धातु या चालक की विधुत चालकता इतनी बढ़ जाती है कि वह सामान्य विधुतीय नियमों का भी उलंधन करने लगती है ऐसी स्तिथि को अतिचालकता कहते हैं. 
जब किसी चालक धातु की तार से विधुत धारा गुजारी जाती है तो तो वो धातु उस विधुत धारा के प्रवाह मे प्रतिरोध अवश्य उत्पन्न करती है.
http://en.wikipedia.org/wiki/Heike_Kamerlingh_Onnes
सन १९११ मे केमर्लिंग ओंस वैज्ञानिक ने यह खोज की कि यदि पारे नामक धातु जो की तरल धातु है उस को परम शून्य ताप के नीचे 4 डिग्री ताप तक ठंडा कर दिया जाए तो अभूतपूर्व रूप से उस की प्रतिरोधक  क्षमता शून्य हो जाती है यानि कि नष्ट हो जाती है.ऐसे मे पारा पूर्ण सुचालक धातु बन जाता है.
इन्होने बताया कि जिस ताप के नीचे यह स्तिथि प्राप्त होती है उस ताप को संक्रमण ताप कहते हैं और चालकता की इस दशा को अतिचालकता कहते हैं.
अतिचालक तार से बने हुए किसी बंद परिपथ की विद्युत धारा किसी विद्युत स्रोत के बिना सदा के लिए स्थिर रह सकती है.
यहाँ एक बात विशेष है कि  जिन परमाणुओं के बाह्य कोष इलेक्ट्रॉनों की संख्या 5 अथवा 7 है उनमें संक्रमण ताप उच्चतम होता है और अतिचालकता का गुण भी उत्कृष्ट होता है.
मिश्रधातु अतिचालक 
जस्ता (Zn),एलुमिनियम (Al),टिन(Sn) परम शून्य ताप के नीचे अतिचालकता प्रकट करते हैं जबकि समान्यतया प्रयुक्त चालक धातुएं ताम्बा (कापर Cu) और चाँदी (सिल्वर Ag) परम ताप से नीचे ठंडा करने पर भी प्रतिरोधकता प्रकट करते हैं शून्य प्रतिरोध नहीं होते हैं.  
यदि वैज्ञानिक कोई ऐसी सस्ती अतिचालक धातु या मिश्र धातु बना लेते हैं तो विधुत भंडारण का काम इतना आसान हो जाएगा कि उसे जब मर्जी इस्तेमाल किया जा सकेगा चाहे अनंत काल तक भी,अतिचालकों  उपयोग ऊर्जा के भण्डारण के लिये किया जा सकेगा क्योंकि किसी अतिचालक लूप में एक बार धारा स्थापित करके छोड़ देने पर वह अनन्त काल तक चलती रहेगी.
अतिचालकता के सिद्धांत को समझाने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं. किंतु इनमें से अधिकांश को केवल आंशिक सफलता ही प्राप्त हुई है. वर्तमान काल में बार्डीन, कूपर तथा श्रीफर द्वारा दिया गया सिद्धांत पर्याप्त संतोषप्रद है। इसका संक्षिप्त नाम वी.सी.एस. सिद्धांत है. इसके अनुसार अतिचालकता चालक इलेक्ट्रॉनों के युग्मन से उत्पन्न होती है. यह युग्मन इलेक्ट्रॉनों के बीच आकर्षक बल उत्पन्न हो जाने से पैदा होता है.आकर्षक बल उत्पन्न होने का मुख्य कारण फोनान या जालक कपनों (लैटिस वाइब्रेशन) का अभासी विनिमय (वरचुअल एक्सचेंज) है.
अतिचालक तारों के लगने से लाईन लास शून्य हो जाएगा जिस कारण विधुत को तारों द्वारा दूर दूर तक बिना किसी  नुकसान के भेजा जा सकेगा.
इसका उपयोग मैगनेटिक लैविटेशन (magnetic lavitation) में किया जा सकेगा.
भविष्य में इनका उपयोग अत्याधिक छोटे एवं अधिक कार्य करने वाले गर्म ना होने वाले ट्रान्सफार्मर, मोटर, विद्युत जनित्र, आदि बनाने में किया जा सकता है.
एक सस्ते अतिचालक के आ जाने से शूक्ष्म मशीनें बनाना भी सम्भव हो जाएगा क्यूंकि शूक्ष्म मशीनों मे अति बारिक तार लगेंगे अन्य चालकों के बारिक तार भी उपलब्ध हैं परन्तु प्रतिरोध होने के कारण वो गर्म हो जाते हैं और पिंघल भी जाते हैं.
इस समय अतिचालको उपयोग सुपर कंप्यूटर और ब्रेन इमेजिंग उपकरणों में हो रहा है.
       

गुरुवार, 9 जून 2011

क्या होते हैं प्रतिजैविक पदार्थ ? What are the antibiotics ?

क्या होते हैं प्रतिजैविक पदार्थ ? What are the antibiotics ?
छोटी कक्षाओं मे  पढते थे कि प्रतिजैविक पदार्थ वे पदार्थ होते हैं जो सुक्ष्म जीवों से उत्पन्न हो और सूक्ष्म जीवों के लिए ही घातक हो उन्हें  प्रतिजैविक पदार्थ कहते हैं.
इस साधारण परिभाषा मे ही छिपा है इसकी खोज का राज़.
आओ जाने क्या होते हैं  प्रतिजैविक पदार्थ,
प्रतिजैविक पदार्थ यानी एंटीबायोटिक्स वे पदार्थ है जो  एंटीबायोसिस कहे जाने वाले एंटीबायोटिक्स वैसी दवाएं हैं, जो बैक्टीरिया के खिलाफ काम करती हैं. एंटीबायोसिस शब्द का मतलब है "जीवन के खिलाफ" और  जिन की खोज के बाद मनुष्य की ओसत आयु बढ़ी है पहले छोटी छोटी बीमारियों से ही मर जाया करते थे परन्तु चिकत्सा जगत मे प्रतिजैविक पदार्थ के पदार्पण से तस्वीर ही बदल गयी इलाजों की.
एंटीबायोटिक  प्रतिजैविक एक पदार्थ या यौगिक है, जो जीवाणु को या तो  मार डालता है या उसके विकास को ही रोक देता है. प्रतिजैविक कृत्रिम और प्राकृतिक दोनों तरीकों से बनाए जा सकते हैं.
 कृत्रिम- जैसे सल्फोनामाइड्स, प्राकृतिक- जैसे पेनिसिलिन
आओ अब जाने पहले प्रतिजैविक पदार्थ पेनिसिलिन की खोज कैसे हुई ?
अलेक्जेंडर फ्लेमिंग 
पहले प्राकृतिक एंटीबायोटिक- पेनिसिलिन की खोज 1928 में अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने की. फ्लेमिंग का जन्म 6 अगस्त 1881 को हुआ था. 
परन्तु "एंटीबायोटिक" शब्द का प्रयोग 1942 में सेलमैन वाक्समैन द्वारा किया जा चुका था वह पदार्थ जो किसी  एक सूक्ष्म जीव द्वारा उत्पन्न किये गये ठोस या तरल पदार्थ हो और जो उच्च तनुकरण में अन्य सूक्ष्मजीवों के विकास के विरोधी होते हैं या फिर उन्हें मार गिराते है. 
जो जीवाणुओं को मारते हैं, उन्हें जीवाणुनाशक जर्मिसिडिन एजेंट कहा जाता है और जो जीवाणु के विकास को दुर्बल करते हैं, उन्हें बैक्टीरियोस्टेटिक एजेंट कहा जाता है. 
विश्व की सबसे पहली एंटीबायोटिक  प्रतिजैविक दवा पेनिसिलिन है इसकी खोज पर अलेक्जेंडर फ्लेमिंग को नोबुल प्रुस्कार भी मिला था. 
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अलेक्जेंडर फ्लेमिंग द्वारा स्टैफिलोकोकी नामक बैक्टीरिया पर शोध करते  हुए यह पाया कि  बैक्टीरिया कल्चर  प्लेट पर थोड़ी सी फंफूंदी उगी हुई  है। और  जितनी दूर यह पेनेसिलियम नामक फंफूदी उगी हुई थी उतनी दूर बैक्टीरिया नहीं थे । 
Penicillium notatum
उसने इस पेनेसिलियम नामक फंफूदी पर और शोध किया  और पाया कि यह बैक्टीरिया को नष्ट  में पूरी तरह सक्षम है.  पेनेसिलियम  से निकलने वाले द्रव ने प्लेट पर पड़े जीवाणुओं की गतिविधियों को धीमा कर दिया और आश्चर्यजनक तरीके से आसपास के जीवाणु या तो मर गए या फिर दूर हट गए.
शुरूआत में अलेक्जेंडर फ्लेमिंग मोल्ड जूस का नाम दिया  जो बाद में पेनिसिलीन में के नाम से विख्यात हुआ.
यही थी विश्व की पहली एण्टीबायोटिक प्रतिजैविक दवा पेनिसिलिन.बहुत अधिक खर्चीली और जटिल प्रक्रिया होने  के कारण फ्लेमिंग ने अपना शोध कार्य धीमा कर दिया था.  
Penicillium mold colony.
परन्तु कुछ वर्षों बाद दो अन्य शोधार्थियों के प्रयासों से विश्व इस दुर्लभ संजीवनी से रूबरू हो पाया.यहाँ एक बात बकौल काबिलेगौर है; पेनिसिलिन के रूप में पहले एंटीबॉयोटिक की खोज का श्रेय भले ही सर अलेक्जेंडर फ्लेमिंग को जाता हो,
परन्तु उनके काम पर 1928 में अलेक्जेंडर फ्लेमिंग द्वारा पेनिसिलिन की खोज किये जाने तक वैज्ञानिक समुदाय ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. यहां तक कि तब पेनिसिलिन की चिकित्सीय क्षमता पर पूरा विश्वास नहीं था. उसके दस साल बाद, अर्नस्ट चेन और  ऑस्ट्रेलियाई औषध विज्ञानी होवार्ड वाल्टर फ्लोरे ही थे, जिन्होंने उनके शोध को आगे बढ़ाते हुए इसे पृथक अवस्था में प्राप्त किया। चेन व फ्लोरे ने ही वर्ष 1941 में 12 फरवरी को पेनिसिलिन का इंसान पर पहला परीक्षण किया था.
उन्होंने यह परीक्षण 43 वर्षीय अल्बर्ट अलेक्जेंडर नामक एक शख्स पर किया था, जिसके चेहरे पर गुलाब की कंटीली झाड़ियों से खरोंचें आ गई थीं।
इनमें जीवाणुओं का इतना संक्रमण फैल गया था कि चेहरे पर जगह-जगह फोड़े हो गए और उसकी एक आंख तक निकालनी पड़ी। अल्बर्ट को भीषण दर्द था और तमाम दवाइयां बेअसर साबित हो रही थीं। लिहाजा उसने इस नई औषधि से खुद के ‘इलाज’ की इजाजत दे दी। पेनिसिलिन का पहला इंजेक्शन लगाने के चार दिनों के भीतर ही उसकी हालत में जबरदस्त सुधार आया और घाव भी भरने लगे। लेकिन इसकी सीमित मात्रा उपलब्ध होने की वजह से उपचार रोकना पड़ा, जिसके चलते संक्रमण दोबारा बढ़ गया और चार हफ्ते बाद ही उसकी मौत हो गई।  
फ्लोरे और चैन ने पेनिसिलिन को शुद्ध करने में कामयाबी पाई. इस शुद्ध किये गये एंटीबायोटिक ने जीवाणुओं की एक विस्तृत श्रृंखला के खिलाफ जीवाणुरोधी गतिविधि का प्रदर्शन किया. इसमें विषाक्तता भी कम थी और प्रतिकूल प्रभाव पैदा किये बिना इन्हें लिया जा सकता था. इसके अलावा, इसकी गतिविधि मवाद जैसे जैविक घटकों से अवरुद्ध नहीं होती थी, जैसा कि उस समय उपलब्ध सिंथेटिक एंटीबायोटिक सल्फोनामाइड के प्रयोग से होता था. इतनी ताकतवर एंटीबायोटिक पेनिसिलिन की खोज अभूतपूर्व थी. 
सभी चित्र गूगल से साभार    

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

क्या है अस्थानिक गर्भ ? Ectopic pregnancy ?

क्या है अस्थानिक गर्भ ? Ectopic pregnancy ?
जो गर्भ अपने स्थान से हट कर अन्य कहीं स्थापित होता है उस को अस्थानिक गर्भ कहते है वैसे गर्भ की निश्चित जगह तो गर्भाशय यानी यूटरस है परन्तु कईं बार गर्भ इस के आलावा भी कहीं और ठहर जाता है आओ जाने इस बारे में,
नर जनन कोशिका शुक्राणु का मादा जनन कोशिका अंडाणु से मिलन निषेचन कहलाता है निषेचन क्रिया डिम्ब वाहिनी फेलोपियन ट्यूब में संपन्न होती है फिर यह निषेचित अंड फिर गर्भाशय में स्थापित हो कर वृद्धि को प्राप्त होता है परन्तु यदि कभी कभी गर्भावस्था की प्रारम्भिक दिक्कतों के कारण गर्भाधारण के बाद निषेचित अंड गर्भाशय तक नहीं पहुँच पता और डिम्ब वाहिनी में ही अटक जाता है |
An ectopic pregnancy is one in which the fertilized egg implants in tissue outside of the uterus and the placenta and fetus begin to develop there. it's also commonly referred to as a tubular pregnancy, but the egg can plant itself in the cervix, ovaries, and the abdomen. 
बहुत कम ऐसा भी होता है कि निषेचन  अंडाशय  ओवरी  में भी हो जाता है |
और कम ही ऐसा भी  होता है कि निषेचन डिम्बवाहिनी के बहार या मुहाने पर हो जाता है |
 फेलोपियन ट्यूब से बाहर निषेचन या निषेचित अंड का फेलोपियन ट्यूब से बाहर  अंडाशय की तरफ मूव कर जाना उदर गुहा गर्भधारण कहलाता है उदर गुहा में ही निषेचित अंड का रोपण हो जाता है और यहीं पर ही उस को रक्त आपूर्ती होने लगती है और भ्रूण विकसित होने लगता है इसप्रकार के गर्भ प्राय रुकते नहीं है परन्तु कईं बार कम स्तिथियों में ही गर्भ का पूरा विकास भी हो जाता है इस प्रकार की सारी गर्भावस्थाओं को अस्थानिक(स्थान से हट कर) गर्भावस्था कहते हैं |  
कुछ अन्य सम्भावित अस्थानिक गर्भ की स्तिथियाँ 

    क्या कारण हो सकते हैं अस्थानिक गर्भधारण के ?
फेलोपियन ट्यूब में रुकावट 
गर्भाशयी संक्रमण 
फेलोपियन  ट्यूबों में संरचनात्मक विकार 
पूर्व सीजेरियन विकार (यानी पहले कभी यदि शल्य चिकत्सा करवाई गयी हो तो कुछ विकार उत्पन्न/रह जाते है ) 
पूर्व अस्थानिक गर्भ की पृष्ठभूमि
असफल  डिम्बवाहिनी बंधन 
प्रजनन शक्ति बढाने वाली दवाओं का सेवन भी इसका एक कारण हो सकता है 
और या फिर सहवास के तुरंत बाद ली जाने वाली गर्भ निरोधक पिल्स |
आजकल आधुनिक चिकत्सा उपकरणों से इस स्थिति का उचित उपचार सम्भव है चिकित्सक की निगरानी में कईं सफल प्रसूति केस सम्पूर्ण करावाये जाते हैं परन्तु गंभीर स्तिथियों में चिकित्सक विभिन्न अत्याधुनिक विधियों का प्रयोग करके गर्भ को हटा देते है परम्परागत सीजेरियन तरीकों से कईं बार पुराने समय के चिकित्सक महिला की डिम्बवाहिनियाँ,अंडाशय और गर्भाशय तक हटा देते थे जिस से वो महिला भविष्य में कभी गर्भवती नहीं हो पाती थी  परन्तु अब अत्याधुनिक लेप्रोस्कोपिक निदान से बिना किसी अंग हानि के निदान सम्भव है |
(यह मात्र जानकारी है कोई विशेषज्ञ लेख नहीं है)