Global Cooling लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Global Cooling लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 18 सितंबर 2011

क्या सच है वैश्विक शीतलन?What Is Global Cooling?

क्या सच है वैश्विक शीतलन ? What  Is  Global Cooling ?
u4mix.com
मानवीय क्रियाकलाप और क्या क्या दिन दिखाएँगे अभी यह अनुमान लगाना जरूरी है पिछले अनुभव बताते हैं कि जब जब बर्फ तेजी से पिंघली है उस के बाद ठण्ड अचानक बढ़ी है.
ग्लोबल वार्मिंग के दौरान बर्फ पिंघली है और उस के पिंघलने के बाद फिर ठंडक पैदा होगी तो वो स्तिथि ग्लोबल कूलिंग कहलाएगी.
हम उत्तर भारत की स्तिथि पर गौर करें तो गत वर्षों मे ठण्ड बढ़ी है लोगों को ये कहते सुना है कि इस बार जैसी ठण्ड तो जिंदगी मे पहली बार देखी है.
जब सं २००५ मे मुंबई मे अचानक बर्फबारी देखी तो लोग सकते मे आ गए, 
२००४ मे शिवालिक की निचली चोटियों,पर्वतों पर बर्फ बिछ गयी जिसने कि मौसमविदो को चौंका दिया, सन्  २००८ मे भारतीय कृषि शोध संस्थान पूसा के खेतों मे व गत वर्ष इंडिया गेट दिल्ली के पास बर्फ के कण गिरे देखे गए.
angryconservative.com
शोध बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिग के साईड इफेक्ट के रूप मे ग्लोबल कूलिंग भी पृथ्वी का दरवाजा खटखटा रही है.
आप ब्रिटेन में क्या हुआ यह देखो,दस साल पहले ब्रिटेन के लिए ग्लोबल वार्मिंग के संदर्भ में यह कहा गया था और कि अब ब्रिटेन मे बर्फ अतीत की बात होगी परन्तु इस सर्दी मे दिसंबर 2010 मेंलगभग एक महीने के लिए में पूरा ब्रिटेन कूलिंग के कारण अपंगता जैसी स्तिथि मे आ गया था.  
अगले 2-3 दशकों मे ही वैश्विक ठण्ड वैश्विक उष्मन की अपेक्षा अधिक हो जाएगी जो कि हानिकारक है ग्लोबल वार्मिंग की  तुलना में.
१९७० के दशक मे जब पहली बार ग्लोबल कूलिंग का जिक्र आया तो वैज्ञानिकों की मिश्रित सी प्रतिक्रिया थी परन्तु आज जब वैश्विक उष्मन के चरम को झेल चुकी पृथ्वी तप कर गर्म हो जानी चाहिए थी ऐसी स्तिथि मे वैश्विक शीतलन दस्तक दे रही है.
वैज्ञानिकों की रिपोर्ट्स के अनुसार माना जा रहा है कि पृथ्वी पर खड़ा दो तिहाई पानी कभी भी ठंडा हो कर बर्फ बनने की स्तिथि मे आ सकता है जब यदि दक्षणी ध्रुव की चोदह सो फीट मोटी बर्फ की परत यदि पिंघल जाती है तो हिंद महासागर मे २०० मीटर पानी उपर चढ़ जायेगा जिसके परिणाम स्वरूप पिंघली बर्फ की ठण्ड के कारण भीषण ग्लोबल कूलिंग का सामना करना पडेगा.
एयरोसोल्ज यानि जीवाश्म इंधनो के दहन से उत्पन्न छोटे कण की वातावरण में संख्या बढ़ जाती हैजो कि सौर विकिरण के तापीय घटक को वापिस अंतरिक्ष मे भेज देते हैं जिस कारण सौर उष्मा का मान कम हो जाता है जो कि वैश्विक शीतलन का सीधा सीधा संकेत है. 
http://climatechangedispatch.com
यहाँ तक की  नेल्सन मंडेला मेट्रोपोलिटन विश्वविद्यालय के एक सेवानिवृत्त भौतिकी के प्रोफेसर ग्लोबल वार्मिंग के सिद्धांत को अस्वीकार कर दिया है, उनका तर्क है कि वैश्विक तापमान वास्तव में ठण्ड की और अग्रसर है. उन्होंने कहा "राजनेता, ग्रीनपीस और मीडिया इन ग्लोबल वार्मिंग झूठ के लिए जिम्मेदार हैं." उन्होंने जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र के स्तर में एक खतरनाक वृद्धि की चेतावनी का मजाक उड़ाया है और साफ़ तौर पर कहा है कि जलवायु परिवर्तन के झूठ को इस तरह से लोगों के बीच वैध पर्यावरण चिंताओं के रूप मे  राजनीतिक और वित्तीय एजेंडे को आगे करने के लिए चालाकी से किया गया है जिसका सीधा सीधा नुकसान विकासशील देशों को होगा जो कि सब्सिडी प्राप्त कर रहे थे वो निकाल बाहर किये जायेंगे.
इस वक्तव्य से तो स्पष्ट होता है कि ग्लोबल वार्मिंग झूठ का सफ़ेद हाथी खड़ा किया गया है जबकि पृथ्वी और वैश्विक प्रवृत्ति शीतलन की है ना कि उष्मन की इतिहास इसका गवाह है पृथ्वी को कईं हिम युगों को झेलना पड़ा है . 
अब वैज्ञानिक चेतावनियों मे कितनी सच्चाई है यह तो भविष्य के गर्त मे छिपा है परन्तु एक बात सच है कि मानवीय प्रदूषणकारी क्रियाकलाप इस पृथ्वी पर एक और हिमयुग लाने की तैयारी पूरी कर चुके हैं.