रविवार, 18 सितंबर 2011

क्या सच है वैश्विक शीतलन?What Is Global Cooling?

क्या सच है वैश्विक शीतलन ? What  Is  Global Cooling ?
u4mix.com
मानवीय क्रियाकलाप और क्या क्या दिन दिखाएँगे अभी यह अनुमान लगाना जरूरी है पिछले अनुभव बताते हैं कि जब जब बर्फ तेजी से पिंघली है उस के बाद ठण्ड अचानक बढ़ी है.
ग्लोबल वार्मिंग के दौरान बर्फ पिंघली है और उस के पिंघलने के बाद फिर ठंडक पैदा होगी तो वो स्तिथि ग्लोबल कूलिंग कहलाएगी.
हम उत्तर भारत की स्तिथि पर गौर करें तो गत वर्षों मे ठण्ड बढ़ी है लोगों को ये कहते सुना है कि इस बार जैसी ठण्ड तो जिंदगी मे पहली बार देखी है.
जब सं २००५ मे मुंबई मे अचानक बर्फबारी देखी तो लोग सकते मे आ गए, 
२००४ मे शिवालिक की निचली चोटियों,पर्वतों पर बर्फ बिछ गयी जिसने कि मौसमविदो को चौंका दिया, सन्  २००८ मे भारतीय कृषि शोध संस्थान पूसा के खेतों मे व गत वर्ष इंडिया गेट दिल्ली के पास बर्फ के कण गिरे देखे गए.
angryconservative.com
शोध बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिग के साईड इफेक्ट के रूप मे ग्लोबल कूलिंग भी पृथ्वी का दरवाजा खटखटा रही है.
आप ब्रिटेन में क्या हुआ यह देखो,दस साल पहले ब्रिटेन के लिए ग्लोबल वार्मिंग के संदर्भ में यह कहा गया था और कि अब ब्रिटेन मे बर्फ अतीत की बात होगी परन्तु इस सर्दी मे दिसंबर 2010 मेंलगभग एक महीने के लिए में पूरा ब्रिटेन कूलिंग के कारण अपंगता जैसी स्तिथि मे आ गया था.  
अगले 2-3 दशकों मे ही वैश्विक ठण्ड वैश्विक उष्मन की अपेक्षा अधिक हो जाएगी जो कि हानिकारक है ग्लोबल वार्मिंग की  तुलना में.
१९७० के दशक मे जब पहली बार ग्लोबल कूलिंग का जिक्र आया तो वैज्ञानिकों की मिश्रित सी प्रतिक्रिया थी परन्तु आज जब वैश्विक उष्मन के चरम को झेल चुकी पृथ्वी तप कर गर्म हो जानी चाहिए थी ऐसी स्तिथि मे वैश्विक शीतलन दस्तक दे रही है.
वैज्ञानिकों की रिपोर्ट्स के अनुसार माना जा रहा है कि पृथ्वी पर खड़ा दो तिहाई पानी कभी भी ठंडा हो कर बर्फ बनने की स्तिथि मे आ सकता है जब यदि दक्षणी ध्रुव की चोदह सो फीट मोटी बर्फ की परत यदि पिंघल जाती है तो हिंद महासागर मे २०० मीटर पानी उपर चढ़ जायेगा जिसके परिणाम स्वरूप पिंघली बर्फ की ठण्ड के कारण भीषण ग्लोबल कूलिंग का सामना करना पडेगा.
एयरोसोल्ज यानि जीवाश्म इंधनो के दहन से उत्पन्न छोटे कण की वातावरण में संख्या बढ़ जाती हैजो कि सौर विकिरण के तापीय घटक को वापिस अंतरिक्ष मे भेज देते हैं जिस कारण सौर उष्मा का मान कम हो जाता है जो कि वैश्विक शीतलन का सीधा सीधा संकेत है. 
http://climatechangedispatch.com
यहाँ तक की  नेल्सन मंडेला मेट्रोपोलिटन विश्वविद्यालय के एक सेवानिवृत्त भौतिकी के प्रोफेसर ग्लोबल वार्मिंग के सिद्धांत को अस्वीकार कर दिया है, उनका तर्क है कि वैश्विक तापमान वास्तव में ठण्ड की और अग्रसर है. उन्होंने कहा "राजनेता, ग्रीनपीस और मीडिया इन ग्लोबल वार्मिंग झूठ के लिए जिम्मेदार हैं." उन्होंने जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र के स्तर में एक खतरनाक वृद्धि की चेतावनी का मजाक उड़ाया है और साफ़ तौर पर कहा है कि जलवायु परिवर्तन के झूठ को इस तरह से लोगों के बीच वैध पर्यावरण चिंताओं के रूप मे  राजनीतिक और वित्तीय एजेंडे को आगे करने के लिए चालाकी से किया गया है जिसका सीधा सीधा नुकसान विकासशील देशों को होगा जो कि सब्सिडी प्राप्त कर रहे थे वो निकाल बाहर किये जायेंगे.
इस वक्तव्य से तो स्पष्ट होता है कि ग्लोबल वार्मिंग झूठ का सफ़ेद हाथी खड़ा किया गया है जबकि पृथ्वी और वैश्विक प्रवृत्ति शीतलन की है ना कि उष्मन की इतिहास इसका गवाह है पृथ्वी को कईं हिम युगों को झेलना पड़ा है . 
अब वैज्ञानिक चेतावनियों मे कितनी सच्चाई है यह तो भविष्य के गर्त मे छिपा है परन्तु एक बात सच है कि मानवीय प्रदूषणकारी क्रियाकलाप इस पृथ्वी पर एक और हिमयुग लाने की तैयारी पूरी कर चुके हैं.  

सोमवार, 1 अगस्त 2011

क्या होती है अतिचालकता ? What is Superconductivity ?

क्या होती है अतिचालकता ? What is Superconductivity
वैज्ञानिक निरंतर इस प्रयास मे हैं कि सामान्य प्रयोग मे भी ऐसी चालक तार बनायी जाए जिस का प्रतिरोध(तार के द्वारा अपने मे से हो कर जाने वाली विधुत को रोक कर ताप मे बदल देना इस से विधुत नष्ट होती है)  न्यूनतम या शून्य हो ऐसा हो जाने से विधुत के चालन के क्षेत्र  मे एक क्रान्ति आ जाएगी.
आओ अब जानते हैं ये क्या है ?
कुछ विशेष परिस्थितियों मे किसी धातु या चालक की विधुत चालकता इतनी बढ़ जाती है कि वह सामान्य विधुतीय नियमों का भी उलंधन करने लगती है ऐसी स्तिथि को अतिचालकता कहते हैं. 
जब किसी चालक धातु की तार से विधुत धारा गुजारी जाती है तो तो वो धातु उस विधुत धारा के प्रवाह मे प्रतिरोध अवश्य उत्पन्न करती है.
http://en.wikipedia.org/wiki/Heike_Kamerlingh_Onnes
सन १९११ मे केमर्लिंग ओंस वैज्ञानिक ने यह खोज की कि यदि पारे नामक धातु जो की तरल धातु है उस को परम शून्य ताप के नीचे 4 डिग्री ताप तक ठंडा कर दिया जाए तो अभूतपूर्व रूप से उस की प्रतिरोधक  क्षमता शून्य हो जाती है यानि कि नष्ट हो जाती है.ऐसे मे पारा पूर्ण सुचालक धातु बन जाता है.
इन्होने बताया कि जिस ताप के नीचे यह स्तिथि प्राप्त होती है उस ताप को संक्रमण ताप कहते हैं और चालकता की इस दशा को अतिचालकता कहते हैं.
अतिचालक तार से बने हुए किसी बंद परिपथ की विद्युत धारा किसी विद्युत स्रोत के बिना सदा के लिए स्थिर रह सकती है.
यहाँ एक बात विशेष है कि  जिन परमाणुओं के बाह्य कोष इलेक्ट्रॉनों की संख्या 5 अथवा 7 है उनमें संक्रमण ताप उच्चतम होता है और अतिचालकता का गुण भी उत्कृष्ट होता है.
मिश्रधातु अतिचालक 
जस्ता (Zn),एलुमिनियम (Al),टिन(Sn) परम शून्य ताप के नीचे अतिचालकता प्रकट करते हैं जबकि समान्यतया प्रयुक्त चालक धातुएं ताम्बा (कापर Cu) और चाँदी (सिल्वर Ag) परम ताप से नीचे ठंडा करने पर भी प्रतिरोधकता प्रकट करते हैं शून्य प्रतिरोध नहीं होते हैं.  
यदि वैज्ञानिक कोई ऐसी सस्ती अतिचालक धातु या मिश्र धातु बना लेते हैं तो विधुत भंडारण का काम इतना आसान हो जाएगा कि उसे जब मर्जी इस्तेमाल किया जा सकेगा चाहे अनंत काल तक भी,अतिचालकों  उपयोग ऊर्जा के भण्डारण के लिये किया जा सकेगा क्योंकि किसी अतिचालक लूप में एक बार धारा स्थापित करके छोड़ देने पर वह अनन्त काल तक चलती रहेगी.
अतिचालकता के सिद्धांत को समझाने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं. किंतु इनमें से अधिकांश को केवल आंशिक सफलता ही प्राप्त हुई है. वर्तमान काल में बार्डीन, कूपर तथा श्रीफर द्वारा दिया गया सिद्धांत पर्याप्त संतोषप्रद है। इसका संक्षिप्त नाम वी.सी.एस. सिद्धांत है. इसके अनुसार अतिचालकता चालक इलेक्ट्रॉनों के युग्मन से उत्पन्न होती है. यह युग्मन इलेक्ट्रॉनों के बीच आकर्षक बल उत्पन्न हो जाने से पैदा होता है.आकर्षक बल उत्पन्न होने का मुख्य कारण फोनान या जालक कपनों (लैटिस वाइब्रेशन) का अभासी विनिमय (वरचुअल एक्सचेंज) है.
अतिचालक तारों के लगने से लाईन लास शून्य हो जाएगा जिस कारण विधुत को तारों द्वारा दूर दूर तक बिना किसी  नुकसान के भेजा जा सकेगा.
इसका उपयोग मैगनेटिक लैविटेशन (magnetic lavitation) में किया जा सकेगा.
भविष्य में इनका उपयोग अत्याधिक छोटे एवं अधिक कार्य करने वाले गर्म ना होने वाले ट्रान्सफार्मर, मोटर, विद्युत जनित्र, आदि बनाने में किया जा सकता है.
एक सस्ते अतिचालक के आ जाने से शूक्ष्म मशीनें बनाना भी सम्भव हो जाएगा क्यूंकि शूक्ष्म मशीनों मे अति बारिक तार लगेंगे अन्य चालकों के बारिक तार भी उपलब्ध हैं परन्तु प्रतिरोध होने के कारण वो गर्म हो जाते हैं और पिंघल भी जाते हैं.
इस समय अतिचालको उपयोग सुपर कंप्यूटर और ब्रेन इमेजिंग उपकरणों में हो रहा है.
       

गुरुवार, 9 जून 2011

क्या होते हैं प्रतिजैविक पदार्थ ? What are the antibiotics ?

क्या होते हैं प्रतिजैविक पदार्थ ? What are the antibiotics ?
छोटी कक्षाओं मे  पढते थे कि प्रतिजैविक पदार्थ वे पदार्थ होते हैं जो सुक्ष्म जीवों से उत्पन्न हो और सूक्ष्म जीवों के लिए ही घातक हो उन्हें  प्रतिजैविक पदार्थ कहते हैं.
इस साधारण परिभाषा मे ही छिपा है इसकी खोज का राज़.
आओ जाने क्या होते हैं  प्रतिजैविक पदार्थ,
प्रतिजैविक पदार्थ यानी एंटीबायोटिक्स वे पदार्थ है जो  एंटीबायोसिस कहे जाने वाले एंटीबायोटिक्स वैसी दवाएं हैं, जो बैक्टीरिया के खिलाफ काम करती हैं. एंटीबायोसिस शब्द का मतलब है "जीवन के खिलाफ" और  जिन की खोज के बाद मनुष्य की ओसत आयु बढ़ी है पहले छोटी छोटी बीमारियों से ही मर जाया करते थे परन्तु चिकत्सा जगत मे प्रतिजैविक पदार्थ के पदार्पण से तस्वीर ही बदल गयी इलाजों की.
एंटीबायोटिक  प्रतिजैविक एक पदार्थ या यौगिक है, जो जीवाणु को या तो  मार डालता है या उसके विकास को ही रोक देता है. प्रतिजैविक कृत्रिम और प्राकृतिक दोनों तरीकों से बनाए जा सकते हैं.
 कृत्रिम- जैसे सल्फोनामाइड्स, प्राकृतिक- जैसे पेनिसिलिन
आओ अब जाने पहले प्रतिजैविक पदार्थ पेनिसिलिन की खोज कैसे हुई ?
अलेक्जेंडर फ्लेमिंग 
पहले प्राकृतिक एंटीबायोटिक- पेनिसिलिन की खोज 1928 में अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने की. फ्लेमिंग का जन्म 6 अगस्त 1881 को हुआ था. 
परन्तु "एंटीबायोटिक" शब्द का प्रयोग 1942 में सेलमैन वाक्समैन द्वारा किया जा चुका था वह पदार्थ जो किसी  एक सूक्ष्म जीव द्वारा उत्पन्न किये गये ठोस या तरल पदार्थ हो और जो उच्च तनुकरण में अन्य सूक्ष्मजीवों के विकास के विरोधी होते हैं या फिर उन्हें मार गिराते है. 
जो जीवाणुओं को मारते हैं, उन्हें जीवाणुनाशक जर्मिसिडिन एजेंट कहा जाता है और जो जीवाणु के विकास को दुर्बल करते हैं, उन्हें बैक्टीरियोस्टेटिक एजेंट कहा जाता है. 
विश्व की सबसे पहली एंटीबायोटिक  प्रतिजैविक दवा पेनिसिलिन है इसकी खोज पर अलेक्जेंडर फ्लेमिंग को नोबुल प्रुस्कार भी मिला था. 
http://hi.wikipedia.org
अलेक्जेंडर फ्लेमिंग द्वारा स्टैफिलोकोकी नामक बैक्टीरिया पर शोध करते  हुए यह पाया कि  बैक्टीरिया कल्चर  प्लेट पर थोड़ी सी फंफूंदी उगी हुई  है। और  जितनी दूर यह पेनेसिलियम नामक फंफूदी उगी हुई थी उतनी दूर बैक्टीरिया नहीं थे । 
Penicillium notatum
उसने इस पेनेसिलियम नामक फंफूदी पर और शोध किया  और पाया कि यह बैक्टीरिया को नष्ट  में पूरी तरह सक्षम है.  पेनेसिलियम  से निकलने वाले द्रव ने प्लेट पर पड़े जीवाणुओं की गतिविधियों को धीमा कर दिया और आश्चर्यजनक तरीके से आसपास के जीवाणु या तो मर गए या फिर दूर हट गए.
शुरूआत में अलेक्जेंडर फ्लेमिंग मोल्ड जूस का नाम दिया  जो बाद में पेनिसिलीन में के नाम से विख्यात हुआ.
यही थी विश्व की पहली एण्टीबायोटिक प्रतिजैविक दवा पेनिसिलिन.बहुत अधिक खर्चीली और जटिल प्रक्रिया होने  के कारण फ्लेमिंग ने अपना शोध कार्य धीमा कर दिया था.  
Penicillium mold colony.
परन्तु कुछ वर्षों बाद दो अन्य शोधार्थियों के प्रयासों से विश्व इस दुर्लभ संजीवनी से रूबरू हो पाया.यहाँ एक बात बकौल काबिलेगौर है; पेनिसिलिन के रूप में पहले एंटीबॉयोटिक की खोज का श्रेय भले ही सर अलेक्जेंडर फ्लेमिंग को जाता हो,
परन्तु उनके काम पर 1928 में अलेक्जेंडर फ्लेमिंग द्वारा पेनिसिलिन की खोज किये जाने तक वैज्ञानिक समुदाय ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. यहां तक कि तब पेनिसिलिन की चिकित्सीय क्षमता पर पूरा विश्वास नहीं था. उसके दस साल बाद, अर्नस्ट चेन और  ऑस्ट्रेलियाई औषध विज्ञानी होवार्ड वाल्टर फ्लोरे ही थे, जिन्होंने उनके शोध को आगे बढ़ाते हुए इसे पृथक अवस्था में प्राप्त किया। चेन व फ्लोरे ने ही वर्ष 1941 में 12 फरवरी को पेनिसिलिन का इंसान पर पहला परीक्षण किया था.
उन्होंने यह परीक्षण 43 वर्षीय अल्बर्ट अलेक्जेंडर नामक एक शख्स पर किया था, जिसके चेहरे पर गुलाब की कंटीली झाड़ियों से खरोंचें आ गई थीं।
इनमें जीवाणुओं का इतना संक्रमण फैल गया था कि चेहरे पर जगह-जगह फोड़े हो गए और उसकी एक आंख तक निकालनी पड़ी। अल्बर्ट को भीषण दर्द था और तमाम दवाइयां बेअसर साबित हो रही थीं। लिहाजा उसने इस नई औषधि से खुद के ‘इलाज’ की इजाजत दे दी। पेनिसिलिन का पहला इंजेक्शन लगाने के चार दिनों के भीतर ही उसकी हालत में जबरदस्त सुधार आया और घाव भी भरने लगे। लेकिन इसकी सीमित मात्रा उपलब्ध होने की वजह से उपचार रोकना पड़ा, जिसके चलते संक्रमण दोबारा बढ़ गया और चार हफ्ते बाद ही उसकी मौत हो गई।  
फ्लोरे और चैन ने पेनिसिलिन को शुद्ध करने में कामयाबी पाई. इस शुद्ध किये गये एंटीबायोटिक ने जीवाणुओं की एक विस्तृत श्रृंखला के खिलाफ जीवाणुरोधी गतिविधि का प्रदर्शन किया. इसमें विषाक्तता भी कम थी और प्रतिकूल प्रभाव पैदा किये बिना इन्हें लिया जा सकता था. इसके अलावा, इसकी गतिविधि मवाद जैसे जैविक घटकों से अवरुद्ध नहीं होती थी, जैसा कि उस समय उपलब्ध सिंथेटिक एंटीबायोटिक सल्फोनामाइड के प्रयोग से होता था. इतनी ताकतवर एंटीबायोटिक पेनिसिलिन की खोज अभूतपूर्व थी. 
सभी चित्र गूगल से साभार    

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

क्या है अस्थानिक गर्भ ? Ectopic pregnancy ?

क्या है अस्थानिक गर्भ ? Ectopic pregnancy ?
जो गर्भ अपने स्थान से हट कर अन्य कहीं स्थापित होता है उस को अस्थानिक गर्भ कहते है वैसे गर्भ की निश्चित जगह तो गर्भाशय यानी यूटरस है परन्तु कईं बार गर्भ इस के आलावा भी कहीं और ठहर जाता है आओ जाने इस बारे में,
नर जनन कोशिका शुक्राणु का मादा जनन कोशिका अंडाणु से मिलन निषेचन कहलाता है निषेचन क्रिया डिम्ब वाहिनी फेलोपियन ट्यूब में संपन्न होती है फिर यह निषेचित अंड फिर गर्भाशय में स्थापित हो कर वृद्धि को प्राप्त होता है परन्तु यदि कभी कभी गर्भावस्था की प्रारम्भिक दिक्कतों के कारण गर्भाधारण के बाद निषेचित अंड गर्भाशय तक नहीं पहुँच पता और डिम्ब वाहिनी में ही अटक जाता है |
An ectopic pregnancy is one in which the fertilized egg implants in tissue outside of the uterus and the placenta and fetus begin to develop there. it's also commonly referred to as a tubular pregnancy, but the egg can plant itself in the cervix, ovaries, and the abdomen. 
बहुत कम ऐसा भी होता है कि निषेचन  अंडाशय  ओवरी  में भी हो जाता है |
और कम ही ऐसा भी  होता है कि निषेचन डिम्बवाहिनी के बहार या मुहाने पर हो जाता है |
 फेलोपियन ट्यूब से बाहर निषेचन या निषेचित अंड का फेलोपियन ट्यूब से बाहर  अंडाशय की तरफ मूव कर जाना उदर गुहा गर्भधारण कहलाता है उदर गुहा में ही निषेचित अंड का रोपण हो जाता है और यहीं पर ही उस को रक्त आपूर्ती होने लगती है और भ्रूण विकसित होने लगता है इसप्रकार के गर्भ प्राय रुकते नहीं है परन्तु कईं बार कम स्तिथियों में ही गर्भ का पूरा विकास भी हो जाता है इस प्रकार की सारी गर्भावस्थाओं को अस्थानिक(स्थान से हट कर) गर्भावस्था कहते हैं |  
कुछ अन्य सम्भावित अस्थानिक गर्भ की स्तिथियाँ 

    क्या कारण हो सकते हैं अस्थानिक गर्भधारण के ?
फेलोपियन ट्यूब में रुकावट 
गर्भाशयी संक्रमण 
फेलोपियन  ट्यूबों में संरचनात्मक विकार 
पूर्व सीजेरियन विकार (यानी पहले कभी यदि शल्य चिकत्सा करवाई गयी हो तो कुछ विकार उत्पन्न/रह जाते है ) 
पूर्व अस्थानिक गर्भ की पृष्ठभूमि
असफल  डिम्बवाहिनी बंधन 
प्रजनन शक्ति बढाने वाली दवाओं का सेवन भी इसका एक कारण हो सकता है 
और या फिर सहवास के तुरंत बाद ली जाने वाली गर्भ निरोधक पिल्स |
आजकल आधुनिक चिकत्सा उपकरणों से इस स्थिति का उचित उपचार सम्भव है चिकित्सक की निगरानी में कईं सफल प्रसूति केस सम्पूर्ण करावाये जाते हैं परन्तु गंभीर स्तिथियों में चिकित्सक विभिन्न अत्याधुनिक विधियों का प्रयोग करके गर्भ को हटा देते है परम्परागत सीजेरियन तरीकों से कईं बार पुराने समय के चिकित्सक महिला की डिम्बवाहिनियाँ,अंडाशय और गर्भाशय तक हटा देते थे जिस से वो महिला भविष्य में कभी गर्भवती नहीं हो पाती थी  परन्तु अब अत्याधुनिक लेप्रोस्कोपिक निदान से बिना किसी अंग हानि के निदान सम्भव है |
(यह मात्र जानकारी है कोई विशेषज्ञ लेख नहीं है) 
 

 

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

क्या है आपदा और आपदा प्रबंधन ? Disaster Management ?

क्या है आपदा और आपदा प्रबंधन ? Disaster Management ?
आपदा प्रबंधन सीखना समय की मांग 
जापान की आपदा ने एक बार फिर बता दिया है कि प्रकृति की मार सब से भयंकर होती है ऐसे में जरूरी हो जाता है कि हम आपदा आने पर किस प्रकार हम बच सके और दूसरों की भी जान बचा सके. आपदा प्रबंधन  के द्वारा हम यह सब  जान सकते है
आपदा को अंग्रेज़ी में Disaster कहा जाता है Hazard,Risk दो अन्य अंग्रेज़ी के समानार्थी शब्द है और हिंदी में भी इस को कईं शब्दों जैसे प्रलय,विपदा,प्रकोप,विपत्ति,खतरा शब्दों से जाना जाता है परन्तु आपदा के लिए सर्वथा Disaster ही उपयुक्त शब्द है
आपदा एक असामान्य घटना है जो थोड़े ही समय के लिए आती है और अपने विनाश के चिन्ह लंबे समय के लिए छोड़ जाती है
प्राकृतिक आपदा को परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि एक ऐसी प्राकृतिक घटना जिस में एक हज़ार से लेकर दस लाख लोग तक प्रभावित हों और उनका जीवन खतरे में हो तो वो प्राकृतिक आपदा कहलाती है
बेशक प्राक्रतिक आपदाएं मनुष्य व अन्य जीवों को बहुत प्रभावित करती है प्राकृतिक आपदा को कई रूपों में जाना जाता है
httpen.wikipedia.orgwikiFileHurricane_Katrina_August_28_2005_NASA.jpg httpen.wikipedia.orgwikiTyphoon httphi.wikipedia.orgwiki%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0Gigante.jpg httpen.wikipedia.orgwikiAvalanche
    उपर के चित्र है: १.हरिकेन २.टायफून ३.सुनामी ४.हिमघाव
हरिकेन, सुनामी, सूखा, बाड़, टायफून, बवंडर, चक्रवात सब मौसम से सम्बन्धित प्राकृतिक आपदा हैं
भूस्खलन और अवधाव या हिमघाव (बर्फ की सरकती हुई चट्टान) ऐसी प्राकृतिक आपदा हैं जिस में स्थलाकृति बदल जाती है
भूकम्प और ज़्वालामुखी(ज़्वालामुखी के कारण अग्निकांड,दावानल)  टेक्टोनिक प्लेट (प्लेट विवर्तनिकी) के कारण आते हैं
टिड्डीदल का हमला,कीटो का प्रकोप  को भी प्राकृतिक आपदा माना गया है
जवालामुखी,भूकम्प,सुनामी,बाड़,दावानल,टायफून,बवंडर,चक्रवात,भूस्खलन ये सब तीव्रगामी आपदाएँ हैं जबकि सूखा,कीटो का प्रकोप,अग्निकांड मंदगामी आपदाएँ है
मानवीकृत (Man Made) आपदाएँ वो हैं जो मानवीय क्रियाकलाप के कारण होते हैं, जैसे अग्निकांड, बाड़े, भूस्खलन, सूखा
यहाँ पर यह बता देना अति आवश्यक हो जाता है कि मानवीय दखल से एक नए प्रकार की आपदा से मनुष्य को दो चार होना पड रहा है और वो है, पर्यावरणीय आपदा वैश्विक ऊष्मन Global Warming.
ओद्योगिक क्रियाकलाप जनसंख्या वृद्धि और प्रकृति के साथ खिलवाड़ ने पर्यावरणीय आपदा को जन्म दिया हैआपदाएँ तो प्राचीन काल से ही आती रही होंगी परन्तु आज के प्रगतिशील मानव ने उनको समझने में जो तेजी ला दी है इससे जन्म हुआ आपदा प्रबंधन का और मनुष्य ने इसके अंतर्गत इन परिस्तिथियों ने जानमाल के कम से कम नुकसान के लिए बहुत से प्रयास किये हैं
कुछ अति विनाशकारी  प्राकृतिक आपदाएं ऐसी थी जिन का जिक्र यहाँ करना जरूरी है जिस के बाद इस अवधारणा ने जन्म लिया की आपदा प्रबंधन क्यूँ जरूरी है
१९९५ की सुनामी,भारत इरान और तुर्की के भयंकर भूकंप, न्यू इंग्लैण्ड व क्युबेक के बर्फीले तूफ़ान, नेब्रास्का में ओलो का कहर, एरिजोना और कलिफोर्निया के दावानल, जापान के भूकम्प आदि त्रासदियाँ आपदा प्रबंधन सिखाने के लिए काफी है
आपदा प्रबंधन के अंतर्गत ही सबसे बड़ा कदम जो उठाया गया कि ऐसी तकनीके विकसित करने पर जोर दिया गया कि आपदा की किसी तरह भविष्यवाणी की जा सके
इस उद्देश्य में अंतरिक्ष विज्ञान से बहुत कामयाबी मिली,उपग्रहों की मदद से हरिकेन, टायफून, बवंडर, चक्रवात की सटीक भविष्यवाणी कर के कई बार लाखों लोगो की जानमाल की हानि को बचाया जा सका है। अब तकनीकों की मदद से यह प्रयास जारी हैं कि किसी तरह भूकंप व सुनामी की भी भविष्यवाणी की जा सके, इसके लिए पालतू व अन्य जन्तुओं के व्यवहार परिवर्तन को भी वैज्ञानिक गौर कर रहे हैं
भूकम्प जैसी आपदा के समय LPG रिसाव आग जैसी दुर्घटना को जन्म देता है,विधुत सप्लाई कट जाती है, जलापूर्ति बंद हो जाती है, जलापूर्ति की घरेलू कनेक्शन पाईप टूट जाने से टैंक का पानी बह जाता है, खाद्य पदार्थ नष्ट हो जाते हैं, लोग मलबे में दब जाते हैं, सड़के मलबे से अट जाती हैं, सहयता देर से पहुँचती है, दोबारा भूकम्प का भय मन में बना रहता है, पीने के साफ़ स्वच्छ पानी का आभाव, कुछ लोग मलबे में से माल तलाश में लूटपाट को बढ़ावा देते है, मृतको की बदबू और महामारी फ़ैल जाती है, सुरक्षित आश्रय नहीं बचता, लोग सहयता सामग्री लूट सकते हैं, जमाखोरी बढ़ जाती है
ऐसी स्थतियों से निपटने के लिए ही आपदा प्रबंधन सीखना अति आवश्यक है यह तो बकायदा अनिवार्य पाठ्यक्रम होना चाहिए और प्रत्येक नागरिक के लिए इसका प्रशिक्षण अनिवार्य होना चाहिए|   

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

क्या होते है अंगराग? what is cosmetics ?

क्या होते है अंगराग,सोंदर्य प्रसाधन?  what is cosmetics ?
http://hi.wikipedia.org
प्राचीन  काल से ही सुंदर दिखने की चाह में मानव जाति  ने अपने शरीर  को सजाने और साफ़ रखने के लिए विभिन्न पदार्थों का प्रयोग किया है, अपने शरीर  को सजाने और साफ़ रखने के लिए प्रयोग की जाने वाली विभिन्न वस्तुओं को अंगराग कहते है|
मनुष्य ने अपने अंगों को आकर्षक.साफ़,स्वच्छ,सुडोल,सुंदर,त्वचा को चमकदार,सुकोमल,दीप्तिमय,मृदु और कांतियुक्त रखने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहा है वैसे तो किसी मनुष्य का सौंदर्य उसकी मानसिक शुद्धि और आंतरिक स्वास्थ्य पर निर्भर करता है फिर भी ये अंगराग और विभिन्न सुगंधे भी उस के व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने के लिए विशेष महत्व रखती है |
आधुनिक काल में तो विभिन्न अंगरागों का उपयोग विभिन्न शारीरिक दोषों को दुरुस्त करने के लिय भी किया जा रहा है हम इन अंगरागों को ओपचारिक सोंदर्य प्रसाधनों के रूप में भे जान सकते है परन्तु इस में वे उपकरण  नहीं आते है जैस कैंची ,उस्तरा, कंघी, विभिन्न प्रकार के ब्रुश,बल कचोटने की चिमटी आदि
तो फिर अंगरागों में आते है बाल सवारने के विभिन्न शैम्पू,खुशबुदार तेल,दाड़ी बनाने की क्रीम जेल साबुन,विलेपन(क्रीम),उबटन,पसीना कम करने वाले टेळक,डीयोडरेन्ड,रंजनशलाका, बिंदी, काजल,मस्कारा, आदि परन्तु नहाने के साबुन और रूम फ्रेशनर्स नहीं |
बालों के प्रसाधन ,तवचा के प्रसाधन ,मुख प्रसाधन ,नख प्रसाधन ,गुप्तंग्क प्रसाधन, गंधमार प्रसाधन आदि     
मनुष्य के शरीर से एक स्निग्ध तरल पदार्थ निकलता है  24 घंटों में यह मात्र 2 ग्राम होता है इसमें वसा जल लवण और नाईट्रोजनयुक्त पदार्थ होते है यदि तवचा से यह रिसाव पर्याप्त मात्रा में होता रहे तो बाल और त्वचा कान्तिमान रहती है |
यह कांति बनाए रखने का एकमात्र सरल उपाय है व्यायाम, व्यायाम करने से शरीर से प्रचुर मात्रा में पसीने के साथ  स्निग्ध तरल पदार्थ निकलता है जिस कारण बाल त्वचा कांतिमय बनी रहती है और त्वचा के छिद्रों में फसी मैल भी निकल जाती है
आजकल के बच्चों, किशोरों  और युवाओं के व्ययामशील ना होने के कारण और प्रदूषण के शिकार होने के कारण त्वचा सूखी या फिर मैल युक्त मुहांसो भरी होती है इन को उपचारित करने के लिए विभिन्न फेसवाश के लवणयुक्त क्षार त्वचा को हानि पहुंचाते हैं|
कुछ परम्परागत अंगराग 
मेहँदी,चंदन,हल्दी,लस्सी,दही,अंडा,कपूर,वनस्पतितेल,कुमकुम,गुलाबजल,निम्बू,आवला,रीठा,शिकाकाई आदि 
    

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

क्या होता है ओस,पाला और कोहरा या धुंध? Whats Dew,Frost and Mist or Fog?

क्या होता है ओस,पाला  और कोहरा या धुंध? Whats Dew,Frost and Mist or Fog?
http://en.wikipedia.org/wiki/Dew
आओ पहले जाने ओस क्या है?
जैसा  कि हम जानते हैं कि वायु मंडल में जल वाष्प मौजूद होती हैं पृथ्वी धरातल रात्री में विकिरण द्वारा ऊष्मा त्याग कर शीतलीकरण प्रक्रिया सम्पन्न करती है| तब इन शीतलीकृत तलों पर संचित जल की बूंदों को ओस कहते है अत: ओस वायु में उपस्थित जल वाष्प के धरातल पर संघनित(वाष्प का द्रव बनना) होने से उत्पन्न होती है| स्वच्छ और शांत रातों में जब धरातल तीव्र गति से ठंडा होता है तब ओस उत्पन्न होती है परन्तु जब रात्रि बादलों युक्त हो तो ग्रीन हाउस प्रभाव के कारण धरातल पूरी तरह से ठंडा नहीं हो पाता इस लिए बादलों वाली रात को ओस नहीं पड़ती|
जल के प्राप्ति जिन स्थानों पर आसानी से नहीं हो सकती हो उन स्थानों पर ओस बूंद संग्रहण विधि Dew Recovering से साफ़ पानी एकत्र करते है इस विधि में दो प्रकार से ओस एकत्र की जा सकती 
http://en.wikipedia.org/wiki/Dew
पतली स्टील वायर यानी कि तार ले कर उस का एक जाल बनाया जाता है जो कि २०-२५ वर्ग फुट तक हो सकता है छत पर या घर के आंगन में १०-१२ फुट ऊँचाई पर, शाम से रात और सुबह तक ओस की बूंदे तारों से फिसल फिसल कर एक धार का रूप लेती हुई एक टैंक में एकत्र होती रहेंगी और २००-३०० लीटर जल प्रतिदिन एकत्र हो जाता है जिस का उपयोग दैनिक कार्यों में जल की आवश्यकता को पूरा करने  के लिए किया जा सकता है  
हिमाचल प्रदेश में इस विधि का प्रयोग करते है |
विदेशों में तो छते ढालदार बनाई जाती है जिन पर से ओस की बूंदे फिसल कर एक टैंक में एकत्र होती है और जल संग्रहण हो जाता है |  
http://en.wikipedia.org/wiki/Frost
आओ अब जाने पाला क्या है? 
आमतौर पर शीतकाल की लंबी राते ज्यादा ठंडी होती है और कईं बार तापमान हिमांक  freezing point पर या इस से भी नीचे चला जता है ऐसी स्थिति में जलवाष्प बिना द्रव रूप में परिवर्तित हुए सीधे ही सुक्ष्म हिमकणों में परिवर्तित हो जाते है इसे पाला कहते है पाला फसलों और वनस्पतियों के लिए बहुत हानिकारक होता है |
उत्तर भारत में दिसम्बर से फरवरी महीने पाला पड़ने वाले दिन है ऐसे में यहाँ के किसान फसलों के छोटे पौधों को बचाने के लिए फसलों की सिंचाई कर देते है खेतों में पानी दिये जाने से आद्रता बढ़ जाने से जल वाष्प अपने में संचित उष्मा से वायु और धरातल को ज्यादा ठंढा नहीं होने देती |   
कोहरा दृश्यता एक किमी से अधिक
आओ अब जाने कोहरा या धुंध क्या है? 
कोहरा वास्तव में एक निम्न स्तरीय मेघ ही होता है वायु मंडल में उपस्थित जलवाष्प जब ओसांक से नीचे जाती है पर हिमांक से उपर रहती है उस स्थिति में पानी की छोटी छोटी बूंदे वायुमंडल में देर तक लटकी रहती हैं| इस स्थिति में दृश्यता बहुत कम हो जाती है इस प्रकार का कोहरा शीतकाल में उत्तरी भारत में देखा जा सकता है |
कईं बार जब कोई गर्म और आद्र वायु ठन्डे धरातलीय इलाके से गुजरती है तो संघनित हो कर कोहरे का रूप लेती है इसे अभिवहन कोहरा कहते हैं |
स्माग दिल्ली में
यहाँ एक और पद 'स्माग' से परिचित होना भी जरूरी है जब कोहरे का धुएं के साथ मिश्रण होता है तो उस को स्माग कहते है स्माग ज्यादातर ओद्योगिक और शहरी क्षेत्रो में जल कणों का कार्बन कणों तथा अन्य सुक्ष्म कणों के मिश्रण से अधिक तीव्रता से बनता है और ज्यादा देर तक बना रहता है इसमें विभिन्न रसायनों की वाष्पे मिल जाने से इसकी प्रकृति अम्लीय भी हो जाती है जो की अधिक हानिकारक है |
धुंध
कुहासा अथवा धुंध भी एक प्रकार का कोहरा ही होता है बस दृश्यता का अंतर होता है यदि दृश्यता की सीमा एक किमी या एक किमी से कम हो तो उसे कुहासा या धुंध कहते हैं कईं बार धूल कणों के मिलने के कारण दृश्यता विसिबिलिटी बहुत कम यानी कुछ मीटर तक ही रह जाती है इस स्थिति में वाहनों की दुर्घटनाएं होती है ऐसे समय में रेल और वायु परिवहन बाधित होता है |
धुंध की स्थिति में सूर्य की किरणों को  धरातल तक पहुँचने में अधिक समय लगता है |