मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

क्या है (52768) 1998 ओआर2? What is 52768 asteroid 1998 OR2?


29 अप्रैल को क्षुद्रग्रह टकराने जैसा कुछ नहीं होगा।
आजकल कुछ ऐसी अफवाहें व आशंकायें  व्यक्त की जा रही हैं कि 29 अप्रैल
2020 को पृथ्वी से एक क्षुद्रग्रह टकराएगा जिससे पृथ्वी  पर जीवन समाप्त हो जाएगा।  शौकिया खगोलविद व विश्व भर की वेधशालाओं में अंतरिक्ष वैज्ञानिक  हमेशा अंतरिक्ष का अवलोकन करते रहते हैं। जिससे वह सौरमंडल में गति कर रहे असंख्य क्षुद्रग्रहों, पुच्छल तारों व अन्य आकाशिय हलचल पर निरन्तर नजर रखते हैं।  मंगल ग्रह और बृहस्पति ग्रह  की ग्रहीय कक्षाओं के बीच एक विशाल क्षुद्रग्रह घेरा (ऐस्टरौएड बेल्ट) हमारे सोलर सिस्टम का एक ऐसा क्षेत्र है जिसमे हज़ारों-लाखों क्षुद्रग्रह (ऐस्टरौएड) सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। इस पट्टी में से कुछ बड़े क्षुद्रग्रह कभी कभी बृहस्पति ग्रह की गुरुत्व शक्ति से मार्ग भ्रमित हो जाते हैं जिससे उनका निर्धारित मार्ग प्रभावित होता है। ऐसा ही एक क्षुद्रग्रह है जिसका नाम नाम जिसका नाम नाम (52768) 1998 ओआर2 है कि पृथ्वी से टकराने की संभावना कई वर्षों से लगाई जा रही थी परंतु वैज्ञानिक गणनाओं के अनुसार वह पृथ्वी से 63 लाख किलोमीटर दूरी से गुजरेगा। यह दूरी बहुत लंबी है। ऐसे में इस ग्रह की पृथ्वी से टकराने की कोई संभावना नहीं है। इस शुद्र ग्रह (52768) 1998 ओआर2 की खोज 1998 में हुई थी यह सूर्य का एक चक्कर पूरा करने में 1344 दिन लगाता है। यह बहुत विशाल है। इसका आकार 1.8 किलोमीटर से 4.1 किलोमीटर है। अंतरिक्ष किसी महानगरीय सड़क जैसा नही होता है कि जिसमे वाहन पास-पास चलते हैं ओर आपस मे भिड़ जाते हैं। आकाशिय पिंडों के बीच लाखों- करोड़ों किलोमीटर की दूरियां होती हैं। मनुष्य सभ्यता के होशहवास में इतने विशाल क्षुद्रग्रह के पृथ्वी से टकराने का कोई रिकॉर्ड नहीं है लेकिन पृथ्वी पर बहुत सी इस तरह की झीलें हैं जो क्रेटर झीलें कहलाती है। अनुमान है कि यह क्षुद्रग्रहों की टक्कर से ही बनी हैं। चंद्रमा की सतह पर भी बहुत से क्रेटर देखने को मिलते हैं जो निश्चित ही क्षुद्रग्रहों के टकराने से बने हैं यदि कोई उल्का (क्षुद्रग्रह के मुकाबले बहुत छोटा) पृथ्वी के वायुमंडल प्रवेश करता भी है तो वह वायुमंडल के साथ घर्षण बल के कारण जलने लगता है और उसका आकार पृथ्वी की सतह पर टकराने तक बहुत छोटा रह जाता है। इन्हें उल्का पिंड कहते हैं। यदि कोई क्षुद्रग्रह पृथ्वी से टकराता है तो टक्कर के कारण बहुत मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होगी जिससे कि विशाल भू-कंपन उत्पन्न होगा। परंतु इस क्षुद्रग्रह (52768) 1998 ओआर2 के मामले में ऐसी कोई डरने घबराने वाली बात नहीं है क्योंकि यह पृथ्वी की बहुत दूरी से गुजरेगा। इसलिए 29 अप्रैल की रात चैन से सोना है। अभी फिलहाल पृथ्वी पर करोना वायरस रूपी संकट का हमें डटकर मुकाबला करना है बस उसी के निपटान में अपना योगदान दीजिये।


शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

क्या होता है शूटिंग स्टार/उल्का बौछार? What is Shooting Star/Meteor Shower?


क्या होता है शूटिंग स्टार/उल्का बौछार?What is Shooting Star/Meteor Shower?
आकाश में एक रोशनी की लकीर सभी को आकर्षित करती है। बहुत से लोग बच्चे उसे देख कर मनोकामना पूरी हो जाना मांगते हैं।
असल मे यह अंतरिक्ष से धूल के छोटे-बड़े कण/टुकड़ों के कारण होते हैं जो पृथ्वी की सतह से 65 से 135 किमी ऊपर जलते हैं। क्योंकि वे ऊपरी वायुमंडल में तीव्र गति से डुबकी लगाते हैं।  पृथ्वी सूर्य के चारों ओर 29 किमी/सेकंड की गति से चक्कर लगा रही है और धूल के ये टुकड़े लगभग 40 किमी/सेकंड की गति से यात्रा कर रहे हैं, इसलिए जब वे हमारे वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, तो उनके पास 30 से 70 किमी/सेकंड की संयुक्त गति होती है।
सारः आसमान में कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर अत्यंत वेग से जाते हुए अथवा पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं उन्हें उल्कापिंड (meteor) और साधारण बोलचाल में 'टूटते तारे' कहते हैं। उल्काओं का जो अंश वायुमंडल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुँचता है उसे उल्कापिंड (meteorite) कहते हैं। पर्सिड्स उल्काएं 60 किमी/सेकंड दर की गति में पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करती हैं। हम इसे आकाश में प्रकाश की एक लकीर के रूप में देखते हैं। उल्का बौछार तब होता है जब हमारी पृथ्वी (ग्रह) उल्कापिंडों के समूह से होकर गुजरता है। उल्का वर्षा का नामकरण आमतौर पर उस समय के 'आकाश के क्षेत्र' (यानि नक्षत्र) के नाम पर किया जाता है जहां वे उत्पन्न होते हैं।    उदाहरण के लिए, प्रसिद्ध Perseids पर्शियड़ उल्कापात, जिसे हम 11-12 अगस्त के आस-पास देखते हैं, इसलिए इसका नामकरण इसलिए किया गया है क्योंकि वे नक्षत्र Perseus से आते हैं। ये धूमकेतु Swift-Tuttle की पूंछ की धूल के कारण होते हैं। पर्शियड़ उल्कापात (Perseid Meteor Shower) अर्ध रात्रि के बाद ययाति तारामंडल की ओर यह घटना पृथ्वी के स्विफ्ट टटल धुमकेतु के द्वारा छोड़े मलबे के मध्य गुज़रने के समय होती है। एक घंटे में 60-100 उल्काये देखी जा सकती है।
लगभग 21-22 मार्च को मेरीट्स उल्कापात का नजारा होता है। जिसमें उल्कापात की तरह 20 उल्का प्रति घंटा होती है।
वास्तव में, ऐसे कई अन्य उल्का बौछार भी हैं जो पेरेसिड्स की तरह हमे अच्छी तरह से ज्ञात नहीं हैं।
अन्य उल्का वर्षा
लियोनिड्स (नक्षत्र लियो में एक चमक के साथ उत्पन्न होती है) 18 नवंबर के आसपास होती है। 14 दिसंबर के आसपास जेमिनीड्स (नक्षत्र मिथुन) में होते हैं।
इसके अलावा भूली भटकी उल्कापात तो रोजाना होता हैं।
वर्ष 2020 के महत्त्वपूर्ण उल्कापात :-

4 जनवरी, 2020 क्वाड्रंटिड्स
 22 अप्रैल, 2020 लिरिड्स
 5 मई, 2020 एटा Aquariids
 जुलाई के अंत में, 2020 डेल्टा Aquariids
 12 अगस्त, 2020 पर्सिड्स
 7 अक्टूबर, 2020 ड्रेकोनिड्स
 21 अक्टूबर, 2020 ओरियोनिड्स
 4-5 नवंबर, 2020 साउथ टॉराइड्स
 11-12 नवंबर, 2020 उत्तर टॉरिड्स
 17 नवंबर, 2020 लियोनिड्स
 13-14 दिसंबर, 2020 जेमिनीड्स
 22 दिसंबर, 2020 उर्सिड्स।




रविवार, 28 जनवरी 2018

क्या होता है सुपर ब्लू ब्लड मून? What is Super Moon, Blue Moon, Blood Moon and Lunar Eclipse?

क्या होता है सुपर ब्लू ब्लड मून? What is Super Moon, Blue Moon, Blood Moon and Lunar Eclipse?
'खगोलीय घटनाओं का आनंद लें डरे नही'
खगोलीय घटनाओं का सभी के लिए अपने अपने अपने मतानुसार विशेष महत्व होता है। ज्योतिषी इसे ज्योतिषिय मान्यताओं से जोड़ कर देखता है तो खगोलशास्त्री, विज्ञान शिक्षक, विद्यार्थी व वैज्ञानिक इसे अनुसंधान व ज्ञानार्जन के उद्देश्यों से देखता है।
विद्यार्थियों को समसामयिक खगोलीय घटनाओं से अपडेट रखने व उनको ये खगोलीय घटनाये दिखाने का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि वो इससे जुड़े विज्ञान को समझ कर इनसे सम्बंधित काल्पनिक कथाओं व इनसे जुड़े अंधविश्वासों से मुक्त हो सकेंगे। उनकी रुचि अंतरिक्ष व खगोलविज्ञान में बढ़ेगी जिससे वो इस क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने का भी मन बना सकते हैं। क्योंकि विज्ञान की अन्य शाखाओं के मुकाबले खगोलविज्ञान व अंतरिक्ष विज्ञान  मे अभी बहुत सी नई खोजों व अविष्कारों की अपार सम्भावनाएं शेष हैं।
कक्षा पांच में ही बच्चों को पढ़ा दिया जाता है कि जब चंद्रमा पृथ्वी के पीछे उसकी  उपच्छाया व प्रच्छाया में आता है तो सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा तक नही पहुंच पाता इस कारण चंद्रमा नही दिखाई पड़ता। इस स्थिति को चंद्रग्रहण कहते हैं। चंद्रग्रहण की अवधि कुछ घंटों की होती है। चंद्रग्रहण को, सूर्यग्रहण के विपरीत, आँखों के लिए बिना किसी विशेष सुरक्षा के देखा जा सकता है।
चंद्रमा का अपना प्रकाश नही होता वह सूर्य के प्रकाश से चमकता है।
क्यों है 31 जनवरी 2018 महत्त्वपूर्ण?
खगोलीय घटनाओं ने सदा से ही मनुष्य को आकर्षित किया है। प्राचीन मानव भी हैरत में पड़ जाता था कि रोज एक ही जगह से देखने पर भी चंद्रमा के आकार परिवर्तन क्यों होता है? पूर्ण चंद्र व अमावस्या उसे अचंभित करते थे। निरन्तर अवलोकन व प्रेक्षण से मानव ने चंद्रकलाओं को समझा।
31 जनवरी को चंद्रमा की कईं सारी खगोलीय घटनाएं एक साथ घटित हो रही हैं ऐसा संयोग 35 वर्ष के बाद बन रहा है। 31 जनवरी को चन्द्रग्रहण, सूपर मून, ब्लू मून, ब्लड मून खगोलीय घटनाएं घटित होंगी। ऐसा पहले 30 दिसम्बर 1982 को घटित हुआ था। पृथ्वी के एक स्थान पर रहने वाले व्यक्ति के लिए खगोलीय घटनाओं की पुनरावृत्ति बहुत लंबे समय बाद होती है इसलिए इन घटनाओं का आनन्द लेना चाहिए न कि इनसे डर कर घर में दुबकना चाहिये।
आओ सुपरमून को जानें।
चंद्रमा पृथ्वी के चारो ओर अपनी दीर्घवृत्ताकार कक्षा में पृथ्वी के चक्कर लगाता है। परिक्रमा पथ दीर्घवृत्ताकार होने के कारण वह एक बार पृथ्वी से अधिकतम दूरी से व एक बार न्यूनतम दूरी से गुजरता है। तो एक समय ऐसा भी आता है जब चंद्रमा पृथ्वी से न्यूनतम दूरी पर स्थित होता है। यदि उस दिन पूर्णिमा भी हो  तो यह परिघटना सुपरमून कहलाती है। ऐसी स्थिति आने पर चंद्रमा उस दिन अन्य पूर्णिमाओं के अपने आकार से 14 प्रतिशत  बढ़ा व 30 प्रतिशत अधिक चमकदार दिखाई देता है। यह स्थिति एस्ट्रो फोटोग्राफर्स के लिए बेहतरीन शॉट्स लेने के लिए उत्तम होती है। सुपरमून शब्द सर्वप्रथम अमेरिकी खगोलविद रिचर्ड नोल द्वारा वर्ष 1979 में प्रयोग किया गया था। सुपरमून कोई आधिकारिक खगोलीय शब्द नहीं है।
' पूर्ण चंद्रमा का अपने परिक्रमा पथ पर पृथ्वी से न्यूनतम दूरी पर होना सुपरमून है।'
आओ जाने क्या हैं ब्लू मून?
वर्ष मास गणना के दो तरीके हैं एक सौर वर्ष व दूसरा चंद्र वर्ष। एक सौर वर्ष के 12 महीनों (365.24 दिन) में 12 चंद्र मास के कुल दिनों (354.36 दिन) से कुछ दिन (5.88 दिन) अधिक होते हैं। इसलिए प्रत्येक 2.7154 वर्ष के अंतराल पर एक मौसम खंड में 3 की बजाय 4 पूर्णिमाएँ पड़ती हैं। इस स्थिति को साधारण शब्दों में कहें तो किसी एक सौर महिने में दो बार चंद्रमा का पूरा निकलना ब्लू मून कहलाता है। इस वर्ष 2 जनवरी को पूर्णिमा थी और अब 31 जनवरी को भी पूर्णिमा है इसलिए 31 जनवरी के पूर्ण चंद्रमा को ब्लू मून नाम दिया गया। खगोल विज्ञान में फार्मर्स अल्मनक द्वारा दी गयी  ब्लू मून की इस परिभाषा को सबसे अधिक मान्यता प्राप्त है।
'ब्लू मून एक खगोलीय मौसम में एक अतिरिक्त पूर्णिमा के अस्तित्व की घटना को कहते है।'
क्यों कहते हैं ब्लड मून (ताम्र चंद्र) ?
चंद्रोदय के समय चंद्रमा जैसे ही पृथ्वी की छाया में आएगा तो उसका रंग ताम्बे के रंग जैसा (हल्का लाल) प्रतीत होता है। इस स्थिति में अंतरिक्ष मे चंद्रमा पृथ्वी की परछाई क्षेत्र में होता है तो उस तक सूर्य का प्रकाश केवल पृथ्वी के वायुमंडल से होकर पहुंचता है। मात्र क्रिश्चियन मान्यताओं में ही ब्लड मून का जिक्र है।
यह दुर्लभ नजारा लेने का समय व स्थान:
31 जनवरी से एक दिन पहले आप एक जगह निर्धारित करले जहाँ से पूर्वी दिशा में चंद्रमा को अच्छे से देखा जा सके। आपके शहर या गाँव में 31 जनवरी को चंद्रोदय जितने बजे होगा उस समय से पूर्व वहाँ पहुँच जाएं।
यमुनानगर में 31 जनवरी को चंद्रोदय का समय सायं 5 बजकर 21 मिनट है। अगर मौसम ने साथ दिया तो ये ग्रहण 31 जनवरी को 6 बजकर 22 मिनट से 8 बजकर 42 मिनट के बीच नजर आएगा। ये नजारा लेने के लिए खुले मैदान में जाकर क्षितिज के साथ से ही चन्द्रोदय के समय से ही उसे देखना होगा। इसके अवलोकन के लिए किसी विशेष उपकरण की आवश्यकता नही होती है। अवलोकन स्थल के आसपास ऊंचे भवन व पेड़ न हों।
इसे भारत के साथ-साथ इंडोनेशिया, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में भी देखा जायेगा। इसे अमेरिका के अलास्का, हवाई और कनाडा में भी अवलोकित किया जा सकेगा।
दर्शन लाल बवेजा समन्वयक सी वी रमन विज्ञान क्लब यमुनानगर हरियाणा

शनिवार, 6 जनवरी 2018

क्या होता है एम्ब्रास सिंड्रोम? What is Ambras syndrome?

क्या होता है एम्ब्रास सिंड्रोम? What is Ambras syndrome?
दुनिया की एक दुर्लभ त्वचा सम्बंधित रोग का नाम एम्ब्रास सिंड्रोम (Ambras syndrome) है। इस प्रकार के रोगी के शरीर पर बालो की अत्यंत अधिकता होती है। चेहरे, पूरे शरीर के साथ साथ अपवाद रूप हथेलियों, पैरों के तलवों समेत नाक की म्यूकस झिल्ली पर भी बालों की अधिकता होती है। यह बालों की वृद्धि छोटे, नरम व भूरे रंग के बालों के रूप में ही होती है। अधिक बालों से ग्रसित इन मनुष्यों को रीछ/भालू, वॉल्फ बॉय/वॉल्फ गर्ल, मंकी फेस आदि उपनामो से पुकार कर शर्मिंदा किया जाता है। यदाकदा इनके चेहरे व दाँतो जबड़ों की बनावट भी असमान्य होती है।
यह रोग गुणसूत्रीय विकृति के कारण होता है। विश्व मे इस रोग से ग्रसित व्यक्तियों की संख्या बहुत कम है। विश्वव्यापी डेटा की कमी के कारण इसके सही कारणों का पता लगने अभी रहस्य बना हुआ है इस अनुवांशिक रोग की परिवारिक हिस्ट्री के लिए लंबे विश्लेषण व जाँच की आवश्यकता होती हैं। व्यापक डाटाबेस का नितांत अभाव है। लेसर ट्रीटमैंट भी असफल रहता ही इन बालो को हटाने के लिए इसलिए ग्रसित चेहरे के बाल हटाने के लिए शेविंग का ही सहारा लेते हैं। एम्ब्रास सिंड्रोम अन्य प्रकार यानी हार्मोन अनियमतता से उतपन्न बालो की वृद्धि से भिन्न रोग है।
ऐसे पेशेंट को विशेष स्नेह के अभिलाषी होते हैं जबकि इनको विशेष उपनामों से पुकारा जाता है जो कि सही नही है। बैंकाक की गिनीज बुक रिकार्ड होल्डर सबसे अधिक बालो वाली लड़की  सुमात्रा ने अब विवाह किया है इसके लिए उसे शेविंग से अपने चेहरे के बाल हटाने पड़े। इस एम्ब्रोस सिंड्रोम से ग्रसित दुनिया भर में 50 मामले बताए जाते हैं।

शनिवार, 30 दिसंबर 2017

क्या है यह? What is this?

क्या है यह? What is this?
आकाश में यह क्या हुआ है ?
22 दिसम्बर शुक्रवार को, स्पेसएक्स रॉकेट(SpaceX rocket) लॉन्च की यह फोटोजेनिक तस्वीर दक्षिणी कैलिफोर्निया(Southern California) और एरिजोना(Arizona) के कुछ हिस्सों में यह काफी उज्ज्वल रूप में देखा गया। एक विशाल अंतरिक्षीय मछली की तरह दिखते वाला, कैलिफोर्निया के लोमपोक के पास वंडनबर्ग एयर फोर्स बेस(Vandenberg Air Force Base) से प्रभावशाली रॉकेट लॉन्च का है उज्जवलता का कारण उस समय अस्त होता सूर्य इसके विपरीत दिशा में था। फाल्कन 9 रॉकेट के द्वारा सफलतापूर्वक पृथ्वी के निचली कक्षा में 10 इरिडियम नेक्स्ट उपग्रहों(Iridium NEXT satellites) को स्थापित कर दिया गया। यह उपग्रह मुख्यतः विकासशील वैश्विक संचार नेटवर्क(developing global communications network) का हिस्सा हैं। इस उपग्रह प्रक्षेपण के पहले चरण को आप दाईं ओर देख सकते है जबकि ऊपरी भाग में रॉकेट बायीं तरफ शीर्ष पर देखा जा सकता है। इस लॉन्च के कई अच्छे वीडियो भी लिए गये है। इस छवि को ऑरेंज काउंटी, कैलिफ़ोर्निया(Orange County, California) द्वारा 2.5 सेकंड के एक्सपोज़र अवधि में कैप्चर किया गया है।
धन्यवाद आशीष श्रीवास्तव जी
स्रोत: APOD(24Dec/Astronomy Picture of the Day)

मंगलवार, 3 मई 2016

क्या होती है कीड़ा जड़ी? What is cordyceps sinensis?

क्या होती है कीड़ा जड़ी? What is cordyceps sinensis?
सामान्य तौर पर समझें तो ये एक तरह का जंगली मशरूम है जो एक ख़ास कीड़े की इल्लियों यानी कैटरपिलर्स को मारकर उसपर पनपता है। इस जड़ी का वैज्ञानिक नाम है कॉर्डिसेप्स साइनेसिस और जिस कीड़े के कैटरपिलर्स पर ये उगता है उसका नाम है हैपिलस फैब्रिकस। स्थानीय लोग इसे कीड़ा-जड़ी कहते हैं क्योंकि ये आधा कीड़ा है और आधा जड़ी है और चीन-तिब्बत में इसे यारशागुंबा कहा जाता है। ‘यारशागुंबा’ जिसका उपयोग भारत में तो नहीं होता लेकिन चीन में इसका इस्तेमाल प्राकृतिक स्टीरॉयड की तरह किया जाता है।
सर्वप्रथम इसका उल्लेख तिब्बती साहित्य में मिलता है। इस उल्लेख के अनुसार यहाँ के चरावाहों ने देखा कि यहाँ के जंगलों में चरने वाले उनके पशु एक विशेष प्रकार की घास जो कीड़े के समान दिखाई देती है, को खाकर हष्ट-पुष्ट एवं बलवान हो जाते हैं। धीरे-धीरे यह घास एक चमत्कारी औषधि के रूप मे अनेक बीमारियों के इलाज के लिए प्रयोग होने लगी। तिब्बती भाषा में इसको यारशागुंबा’ कहा जाता है। जिसका अर्थ होता है ग्रीष्म ऋतु मे घास और शीत ऋतु ऋतु में जन्तु। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार यर्सीगम्बा हिमालयी क्षेत्र की विशेष प्रकार एवं यहाँ पाये जाने वाले एक कीड़े के जीवन चक्र के अद्भुत संयोग का परिणाम है।
शक्ति बढ़ाने में इसकी करामाती क्षमता के कारण चीन में ये जड़ी खिलाड़ियों ख़ासकर एथलीटों को दी जाती है। ये जड़ी 3500 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में पाई जाती है जहां ट्रीलाइन ख़त्म हो जाती है यानी जहां के बाद पेड़ उगने बंद हो जाते हैं। मई से जुलाई में जब बर्फ पिघलती है तो इसके पनपने का चक्र शुरू जाता है रासायनिक दृष्टि से इस औषधि में एस्पार्टिक एसिड, ग्लूटेमिक एसिड, ग्लाईसीन जैसे महत्वपूर्ण एमीनो एसिड तथा कैल्सियम, मैग्नीशियम, सोडियम जैसे अनेक प्रकार के तत्व, अनेक प्रकार के विटामिन तथा मनुष्य शरीर के लिए अन्य उपयोगी तत्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। इसको एकत्रित करने के लिए अप्रैल से लेकर जुलाई तक का समय उपयुक्त होता है। अगस्त के महिने से धीरे-धीरे प्राकृतिक रुप से इसका क्षय होने लगता है और शरद ऋतु के आने तक यह पूर्णतया: विलुप्त हो जाती है। वनस्पतिशास्त्री डॉक्टर एएन शुक्ला कहते हैं, “इस फंगस में प्रोटीनपेपटाइड्सअमीनो एसिडविटामिन बी-1, बी-और बी-12 जैसे पोषक तत्व बहुतायत में पाए जाते हैं। ये तत्काल रूप में ताक़त देते हैं और खिलाड़ियों का जो डोपिंग टेस्ट किया जाता है उसमें ये पकड़ा नहीं जाता।” कीड़ा-जड़ी से अब यौन उत्तेजना बढ़ाने वाले टॉनिक भी तैयार किए जा रहे हैं जिनकी भारी मांग है।

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

क्या हैं गुरुत्वाकर्षण तरंगें Gravitational Waves?

क्या हैं गुरुत्वाकर्षण तरंगें Gravitational Waves?
वैज्ञानिकों ने गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज कर ली है। इनकी अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इन्हें सदी की सबसे बड़ी खोज माना जा रहा है। दशकों से वैज्ञानिक इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि क्या गुरुत्वाकर्षण तरंगें वाकई दिखती हैं। इसकी खोज करने के लिए यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने लीज पाथफाइंडर नाम का अंतरिक्ष यान भी अंतरिक्ष में भेजा था।
महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन से आज से तकरीबन 100 साल पहले ही इस बारे में भविष्यवाणी कर दी थी जोकि सही साबित हुई। इस खोज से न सिर्फ आइंस्टाइन का सिद्धांत प्रमाणीत हुआ है, बल्कि इससे पहली बार 2 टकराने वाले श्याम विवरों (ब्लैक होल) की भी पुष्टि हुई है।
आज से करीब सवा अरब साल पहले ब्रह्मांड में 2 श्याम विवरों (ब्लैक होल) में टक्कर हुई थी और यह टक्कर इतनी भयंकर थी कि अंतरिक्ष में उनके आसपास मौजूद जगह और समय, दोनों विकृत हो गए। आइंस्टाइन ने 100 साल पहले कहा था कि इस टक्कर के बाद अंतरिक्ष में हुआ बदलाव सिर्फ टकराव वाली जगह पर सीमित नहीं रहेगा। उन्होंने कहा था कि इस टकराव के बाद अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण तरंगें(ग्रैविटेशनल तरंगें) पैदा हुईं और ये तरंगें किसी तालाब में पैदा हुई तरंगों की तरह आगे बढ़ती हैं।
अब दुनिया भर के वैज्ञानिकों को आइंस्टाइन की सापेक्षता के सिद्धांत (थिअरी ऑफ रिलेटिविटी) के सबूत मिल गए हैं। इसे अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में बहुत बड़ी सफलता माना जा रहा है। ग्रैविटेशनल तरंगों की खोज से खगोल विज्ञान और भौतिक विज्ञान में खोज के नए दरवाजे खुलेंगे।
गुरुत्वाकर्षण तरंगें पर द्रव्य (matter) का कोई असर नहीं पड़ता और ये ब्रह्मांड में बिना किसी रुकावट के विचरण करती हैं।
गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने आंकड़ो के विश्लेषन(डेटा अनैलिसिस) समेत काफी अहम भूमिकाएं निभाई हैं। इंस्टिट्यूट ऑफ प्लाज्मा रिसर्च. गांधीनगर, इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रॉनामी ऐंड एस्ट्रोफिजिक्स, पुणे और राजारमन सेंटर फॉर अडवांस्ड टेक्नॉलाजी, इंदौर सहित कई संस्थान इससे जुड़े थे।
गुरुत्वीय तरंगों की खोज का ऐलान आईयूसीएए पुणे और वाशिंगटन डीसी अमेरिका में वैज्ञानिकों ने किया। भारत उन देशों में से भी एक है, जहां गुरुत्वाकषर्ण प्रयोगशाला स्थापित की जा रही है।----आशीष श्रीवास्तव
इससे सालों से चल रही गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज का अंत होने की उम्मीद है और ब्रह्मांड के जन्म से जुड़े 'बिग बैंग' के सिद्धांत को समझने के लिए नई खिड़की खुल सकेगी---बी  बी  सी 


रविवार, 31 जनवरी 2016

क्या होता है एम्बर What is Ambar?

क्या होता है एम्बर What is Ambar?
जुरासीक पार्क पिक्चर याद है उसके डाक्टर को एम्बर में मच्छर  का जीवाश्म मिलता है जिसने डायनासोर का खून चूसा होता है .........एम्बर एक जीवाश्म रूप में रेज़िन यानी किसी पेड़ की गोंद है। यह एक किसी ऐसे वृक्ष का जीवाश्म रेज़िन(गोंद) है जो आज कहीं नहीं पाया जाता। इसको कपड़े रगड़ने से इससेआवेश पैदा होताहै। वृक्ष की  गोंद  जो समय के साथ सख़्त होकर पत्थर बन गई हो। यह देखने में एक कीमती पत्थर की तरह लगता है और प्राचीनकाल से इसका प्रयोग आभूषणों में किया जाता रहा है। यह आरम्भ में एक पेड़ से निकला गोंद होता है, इसमें अक्सर छोटे से कीट या पत्ते-टहनियों के अंश भी रह जाते हैं  जब  मानलो यह रिस रहा होता है उस समय कोई कीट पतंगा इस पर बैठ जाए तो वो इससे चिपक जाता था और उसका भी इसमें जीवाश्म रह जाता था। जब एम्बर जमीन में से निकलते हैं तो वह हलके पत्थर के ढ़ेले जैसे लगते हैं। फिर इनको तराशकर इनकी पॉलिश की जाती है जिस से इनका पीला भूरा रंग और चमक निकल आती है और इनके तब अन्दर झाँककर देखा जा सकता है। क्योंकि एम्बर किसी भी  कार्बन, आक्सीजन व हाइड्रोजन का ही तो योगिक होता है और  इन्हें अन्य हाईड्रोकार्बन की तरह जलाया जा सकता है। एम्बर का रासायनिक संगठन में पता चला है की  इससे दो अम्ल C20H30O4 सूत्र के, पृथक किए जा सके हैं, परंतु इन अम्लों के संगठन का अभी सही सही पता नहीं लगा है। 
अब नकली एम्बर भी काच और प्लास्टिक से बनने लगे हैं। नकली एम्बर  की स्पेसीफ़िक डेंसिटी अधिक होती है और यह अल्ट्रावायलेट किरणों से उसमें प्रतिदीप्ति नहीं आती। ऐंबर के अतिरिक्त अन्य कई प्रकार फ़ौसिल रेज़िन भी अनेक देशों में पाए जाते और विभिन्न कामों में प्रयुक्त होते हैं। 



बुधवार, 6 जनवरी 2016

क्या है जेसीबी मशीन? What is JCB Machine?

क्या है जेसीबी मशीन? What is JCB Machine?
हमारे आस-पास ऐसी बहुत सी छोटी छोटी चीज़ें और बातें हैं जिनके बारे में हम जानना नहीं चाहते या जानना पसंद नहीं करते या फिर हमारा ज़ेहन ऐसा होता ही नहीं कि हम जानना चाहें। हम सबने सड़कों पर या किसी कंस्ट्रक्शन साईट पर "पीले रंग" की जेसीबी मशीन गाड़ी (JCB Machine) देखी होंगी और हम आये दिन देखते ही हैं। शायद ही कभी किसी ने सोचा हो कि इसका नाम JCB (जेसीबी) क्यूँ है?  
इस JCB (जेसीबी) का क्या मतलब है? JCB मशीन दुनिया कि पहली ऐसी मशीन है जो बिना नाम के मार्किट में सन 1945 में लाँच हुई। इसको बनाने वाले बहुत दिनों तक इसको क्या नाम दिया जाए इसी में परेशान रहे। और आपको बताऊँ कि JCB (जेसीबी) मशीन का नाम ना होकर इंजन का नाम है। जिन्होंने इस गाड़ी (मशीन) का आविष्कार 1945 में किया उनका नाम "जोसफ सायरिल बमफोर्ड" (Joseph Cyril Bamford) है और आविष्कार करने के बहुत दिनों बाद कोई नाम ना सूझने पर इस एक्स्कावाटर (Excavator) का नाम उन्ही के नाम के इनिशियल पर JCB रख दिया गया। यह मशीन कंस्ट्रक्शन और रियल एस्टेट में पूरी दुनिया में एक नयी क्रांति लेकर आई। बेसिकली यह एक एक्स्केवेशन (Excavation) मशीन है। जिसका कोई टेक्निकल मैकेनिकल और एर्गोनोमिकल नाम है ही नहीं, इसलिए इसे टेक्निकली इंसानी नाम का ब्रांड बनाया गया, (जैसे कार एक मशीन है मगर ब्रांड और लिटरली हम उसे कार के नाम से जानते हैं)। यह दुनिया का पहला ऐसा ब्रांड है जिसे ट्रेडमार्क इसके आविष्कार के 65 साल बाद सन 2009 में किया गया। जेसीबी मशीन (JCB Machines) की एक और ख़ास बात यह है यह पहली "प्राइवेट" ब्रिटिश कंपनी थी जिसने भारत में अपनी फैक्ट्री लगायी थी और आज जेसीबी मशीन (JCB Machines) का पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट भारत से ही किया जाता है। जेसीबी  मशीन (JCB Machines) का रंग पूरे दुनिया में पिछले 65 सालों से पीला ही है। याद रहे की दुनिया का सबसे पुराना ट्रेडमार्क "टाटा संस" जो कि टाटा वालों का है और यह भारत के लिए गर्व करने की बात है।
------महफूज अली 


बुधवार, 25 नवंबर 2015

क्या है लूसी AL 288-1 ? What is Lucy?

क्या है लूसी AL 288-1 ? What is Lucy?
लूसी यह AL 288-1 नामक मादा आदिमानव कंकाल का सामान्य नाम है। यह आधुनिक मानव ’होमो सैपियन्स(Australopithecus afarensis)’ की पूर्वज प्रजाति आस्ट्रेल्प्पिथेकस अफ़रेन्सीस की मादा सदस्य का 40% कंकाल है। लूसी को आज ही के दिन 24 नवंबर 1974 को इथोपिया की अवश घाटी(Awash Valley) मे अफ़ार त्रिभूज(Afar Triangle) के पास एक गांव हडार(Hadar ) मे पाया गया था। यह खोज डोनाल्ड जानसन(Donald Johanson) ने की थी।
मानव जीवन के विकास के अध्ययन को पेलेन्थ्रोपोलोजी (paleoanthropology) कहा जाता है। इस क्षेत्र मे संपूर्ण आदि मानव कंकाल नही मील पाते है, अधिकतर कंकालो के कुछ भाग, कुछ अस्थियाँ ही प्राप्त हो पाती है। लेकिन लूसी की खोज असाधारण थी, इस मामले मे उसका अधिकतर कंकाल प्राप्त हुआ था। लूसी की खोज ने उसके बारे मे और उस समय के मानव के बारे मे कई नयी जानकारीयाँ प्रदान की थी।
यह कंकाल लगभग 32 लाख वर्ष प्राचीन है। इस कंकाल की खोपड़ी छोटी है और वानरो से मेल खाती है, यह मानव दो पैरो पर चलता था और सीधा खड़ा हो सकता था जोकि आधुनिक मानवो के समान है। इन प्रमाणो से यह पता चला कि सीधे खड़े होकर चलने का मानव मस्तिष्क से कोई सीधा संबंध नही है।
लूसी इन द स्काई विथ डाइमन्डस्' बीटल्स का प्रसिद्ध गाना है। जब पुरातत्त्वविदियों कों यह अस्थिपंजर मिला और वे लौट का कैंप में आये तो बीटल्स का यह गाना बज रहा था। इसलिये इसका नाम लूसी रखा गया


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शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

क्या है कोलेस्ट्रॉल? What is Cholesterol?

क्या है कोलेस्ट्रॉल? What is Cholesterol?
कोलेस्ट्रॉल
प्रत्येक वर्ष लाखों लोगों की मृत्यु हृदय रोग से होती है। इसका मुख्य कारण है शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा का सामान्य से अधिक होना। जंक फूड का सेवन, अनियमित निद्रा, योग और एक्सरसाइज से कोसों दूर रहना भी इस समस्या को और गंभीर बना देता है। खानपान और रोजाना की आदत शरीर में कोलेस्ट्रॉल स्तर को बढ़ाती भी है और घटाती भी है। ऐसे में इसका संतुलित रहना आपके स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।
Formula: C27H46O
Molar mass: 386.65 g/mol
IUPAC ID: (3β)-​cholest-​5-​en-​3-​ol
Melting point: 148 °C
Density: 1.05 g/cm³
Boiling point: 360 °C
बिना व कोलेस्ट्रॉल युक्त धमनी 
कोलेस्ट्रॉल एक प्रकार का वसा है, जो रक्त में पाया जाता है। यह मस्तिष्क, त्वचा और अन्य अंगों को विकसित होने और उन्हें सही ढंग से काम करने के लिए बेहद आवश्यक होता है। दरअसल, लीवर शरीर के लिए मोम जैसा एक चिकना पदार्थ बनाता है, यही चिकना पदार्थ कोलेस्ट्रॉल कहलाता है। यह हमारे रक्त के सहारे शरीर के सभी हिस्सों में पहुंचकर शरीर को सुचारू रूप से काम करने में मदद करता है। शरीर के कार्यप्रणाली को ठीक रखने के लिए इसकी एक नियत मात्रा आवश्यक होती है। कुछ खाद्य पदार्थ जैसे मीट, अंडा, मक्खन, चीज, दूध आदि के सेवन से भी कोलेस्ट्रॉल की प्राप्ति होती है। रक्त में वसा के प्रोटीन कॉम्प्लेक्स को लिपो-प्रोटीन कहते हैं। लिपो-कोलेस्ट्रॉल दो प्रकार के होते हैं, ′लो डेन्सिटी लिपोप्रोटीन′ (एलडीएल) और ′हाई डेन्सिटी लिपोप्रोटीन′ (एचडीएल)। एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को खराब (बैड) कोलेस्ट्रॉल भी कहा जाता है। यह रक्त में घुलनशील नहीं होता। एलडीएल के धमनियों की दीवारों में जमा होने से धमनियों में रुकावट होती है, जिससे हार्ट अटैक की आशंका बढ़ जाती है। स्वस्थ रहने के लिए एलडीएल कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होनी चाहिए। एचडीएल कोलेस्ट्रॉल को शरीर के लिए अच्छा माना जाता है। यह खराब कोलेस्ट्रॉल यानी धमनियों की दीवारों पर जमा हुए कोलेस्ट्रॉल को शरीर से बाहर निकाल कर हार्ट अटैक, स्ट्रोक के खतरे को कम करता है।
बीमारियों का घर
जिन्हें डायबिटीज, हाइपरटेंशन, किडनी एवं लीवर की बीमारी और हाइपर थाइरॉयडिज्म की शिकायत होती है, उनमें भी कोलेस्ट्रॉल का स्तर अधिक पाया जाता है। इसके अलावा जिन महिलाओं को मेनोपॉज जल्दी होता है, उनमें भी कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ने की आशंका रहती है। शरीर में कोलेस्ट्रॉल बढ़ने पर यह खून पहुंचाने वाली नलियों में जमा होना शुरू हो जाता है। इससे दिमाग को सही मात्रा में रक्त और ऑक्सीजन नहीं मिल पाता, जिससे स्ट्रोक का खतरा रहता है। इसके बढ़ने से हृदय तक खून पहुंचाने वाली नस भी ब्‍लॉक हो जाती है, जिससे हार्ट अटैक होता है। इतना ही नहीं यह शरीर में रक्त के बहाव को भी प्रभावित करता है।
फायदेमंद भी है
अगर शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा संतुलित है, तो यह फायदेमंद भी हो सकता है। कोलेस्ट्रॉल हमारे शरीर के लिए कई महत्वपूर्ण हॉर्मोन को बनाने में मदद करता है। खानपान के साथ कई तरह के बैक्टीरिया शरीर में प्रवेश कर जाते हैं, जो कई विषैले तत्व छोड़ते हैं। कोलेस्ट्रॉल इन तत्वों को सोखकर शरीर से बाहर निकालने में मदद करता है। शरीर में मौजूद कोशिकाओं की बाहरी परतों को बनाने, उनकी देखभाल करने और उन्हें जीवित रखने का काम कोलेस्ट्रॉल ही करता है। शरीर पर पड़ने वाली सूर्य की किरणों को विटामिन डी में बदलने, वसा में पाए जाने वाले विटामिन ए, डी, ई के लिए भी यह जरूरी है। कोलेस्ट्रॉल भोजन करने के बाद शरीर में पहुंचने वाली वसा को बाइल एसिड बनाकर पचाता है, स्ट्रोजन, प्रोजेस्ट्रोन, टेस्टोस्टरोन हर्मोन का निर्माण करता है और मस्तिष्क के कार्य प्रणाली को भी स्वस्थ रखने में मदद करता है।
डाइट पर दें ध्यान
जंक फूड, तला-भुना और मसालेदार भोजन, धूम्रपान, शराब आदि का सेवन करने वालों में बैड कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ता है। अंडा, लाल मीट, मक्‍खन, पनीर, केक, घी, वसा युक्त भोजन से परहेज करें और फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज, फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल करें। सैचुरेटेड फैट युक्त खाद्य पदार्थों के सेवन से बचें। वजन बढ़ने न दें। पर्याप्त नींद लें। मोटापे पर कंट्रोल करें।
डॉक्टर कहते हैं:
कोलेस्ट्रॉल शरीर के लिए एक अच्छा दोस्त है, लेकिन इसकी ज्यादा मात्रा शरीर को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। ज्यादा तला-भुना या ऑयली खाना, जंक फूड, शराब, सिगरेट, अधिक अंडे या मीट लेना, एक्सरसाइज न करना इसे बढ़ाने में मदद करता है। बढ़ता मोटापा भी इसी कारण होता है। अगर परिवार में इससे संबंधित कोई बीमारी है, तो हर छह महीने के बाद चेकअप कराएं। यह बीपी, शुगर को भी बढ़ाने में मदद करता है। शरीर में कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल में रहे इसके लिए हेल्दी डाइट लें। एक्सरसाइज करें। वजन पर काबू रखें। इससे जुड़ी समस्या होने पर चिकित्सक से संपर्क करें।
डॉ. प्रणव ईश- स्वस्थ जिंदगी के लिए शरीर में बैड नहीं गुड कोलेस्ट्रॉल का होना जरूरी है। वरना आप हृदय के अलावा कई गंभीर बीमारियों के शिकार हो सकते हैं।

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

क्या है बॉडी क्लाक या जैविक घड़ी? What is 'Body Clock' 'Circadian Rhythms' ?

क्या है बॉडी क्लाक या जैविक घड़ी? What is 'Body Clock' 'Circadian Rhythms' ?

बॉडी क्लाक या जैविक घड़ी नियंत्रित करता है प्रतिरक्षा नियंत्रण की कमी और अधिकता 
यह नया अध्ययन महत्वपूर्ण जैविक क्रिया को बताता है जिसे मेडिकल की भाषा में 'शरीर घडी' या 'जैवलय' 'जैविक घड़ी' कहते हैं। अंग्रेजी में इसे 'Body Clock' 'Circadian Rhythms' 'Biological Rhythms' या 'Biological Clock' कहा जाता है। हमारा शरीर जैवलय के अनुरूप कार्य करता है जिसमे रात्री 2बजे हम गहरी नींद में होते हैं प्रातः 4.30 बजे हमारे शरीर का तापमान न्यूनतम होता है 6.45 प्रातः रक्तचाप बढोतरी शुरू होती है फिर हारमोन स्रावण शिथिल, 10 बजे प्रातः हमारा शरीर उच्च सतर्कता स्तर पर होता है और बाद दोपहर तीव्र समन्वयन क्षमता पर होता है। 3.30 बजे दिन में तीव्र प्रतिक्रिया समय होता है। उसके बाद 5 बजे उच्च दक्षता युक्त ह्रदय कार्य क्षमता और मांसपेशीय मजबूती होती है तत्पश्चात 6.30 सायं उच्च रक्तचाप सीमा व 7 सायंकाल उच्च शारीरिक तापमान स्तिथि होती है। 9 रात्री हारमोन स्रावण अधिक और आंतीय हलचल धीमी होनी शुरू हो जाती है। इस 24 घंटे की जैविक प्रक्रिया को  'जैवलयया 'जैविक घड़ी' कहते हैं एक नए अध्ययन से पता चला है कि हमारी शारीरिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया की उच्च और निम्न स्तिथि इसी  'जैवलयया 'जैविक घड़ी' पर बहुत निर्भर करती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि हम कम नींद लेते हैं तो हमारी  'जैवलयप्रभावित होती है साथ साथ हमारी शारीरिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया भी प्रभावित होती है। 
इस अध्ययन से कमजोर प्रतिरक्षा वाले रोगियों के लिए बेहतर ढंग से उपचारात्मक रणनीति बनाई जा सकेगी।
24 घंटे के दैनिक चक्र 'सिकेडीयन क्लाक' के रूप में जाना जाता है येल विश्वविद्यालय के स्कूल आफ मेडिसिन के वरिष्ठ लेखक ऑथर डा. इरोल फाईक्रिग के अनुसार " नींद के आभाव में हमारी दैनिक लय बिगड़ने से हमारी शारीरिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया प्रभावित होती है"
अपने अध्ययन में शोधदल के सदस्यों की रूचि 'सिकेडीयन नियंत्रण' के अंतर्गत प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा रोगजनक कारक और बावक्त प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का पता लगाने में थी। डा. फाईक्रिग और सहयोगियों ने क्षतिकारक रिसेप्टर- 9 (TLR9) की कार्य प्रणाली को समझा और पाया कि यह प्रतिरक्षा प्रोटीन जीवाणु और विषाणु DNA को पहचानता है जब शोधकर्ताओं ने चूहों का प्रतिरक्षण TLR9 से किया तो उनमे  'सिकेडीयन क्लाक' 'जैवलय' नियंत्रित हुई और पाया कि TLR9 शारीरिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को बढाने का एक महत्वपूर्ण नमूना साबित हुआ। रोगग्रस्त मनुष्य में रात्री 2 से 6 बजे के बीच जान का खतरा अधिकतम होता है यह निष्कर्ष स्पष्ट करते हैं कि हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली और  'सिकेडीयन क्लाक' 'जैवलय'  के बीच सीधे आणविक लिंक हैं।

 डा. इरोल फाईक्रिग ने और कहा कि गहन चिकित्सा कक्ष में रोगियों को अक्सर निद्रा गड़बड़ी कम या ज्यादाशोरप्रकाश व दवाओं के प्रयोग से बहुत परेशानी होती है अत् अब यह बहुत जरूरी हो जाता है कि शरीर कैसे TLR9 इन कारकों को भी प्रभावित करेगा। 

बुधवार, 7 जनवरी 2015

क्यों कायम है अमरुद की बादशाहत King guava

क्यों कायम है अमरुद की बादशाहत
अक्सर पेट दर्द और जुकाम खॉसी का जिम्मेदार माना जाने वाला फल अमरुद अब अपने Antioxidants की बदौलत सुपर फूड्स की श्रेणी  में आ गया है। जी हाँ  अमरुद हमारे देश  में पाये जाने वाले फलों में सबसे ज्यादा गुणकारी माना गया है क्योंकि इसमें पाये जाने वाले Antioxidants  कैंसर जैसी गम्भीर बिमारियों से बचा सकते हैं।
राष्ट्रीय पोषण  विज्ञान संस्थान हैदराबाद के अनुसंधान कर्ता डॉ श्रीरामुल्लु ने भारतीय दैनिक आहार के 14 विभिन्न पदार्थो का Antioxidants के लिये विश्लेषण किया। इनमे फल सब्जियॉ मेवे और दालें शामिल थी। अनुसंधानकर्ताओें ने हैदराबाद की विभिन्न मंडियों से अपने सैम्पल इक्ठठे कर पूरे 4 सालों तक ये विश्लेषण  किया जिसके आधार पर अमरुद सर्वोच्च रहा। इस विश्लेषण से अनंसंधानकर्ता भी हैरान हुए बिना नहीं रह पाये।
अमरुद के बाद आम, सेब और शरिफा Antioxidants में अच्छे पाये गये जबकि अनानास, चीकू तरबूज़ और केले में Antioxidants की  मात्रा काफी कम पायी गयी।
ये अपने तरह का पहला अध्ययन है जिससे ये ज्ञात हुआ कि हमारे देश में आम मिलने वाला ये सस्ता सा फल हमें खतरनाक बिमारियों से बचा सकता हैं। अमरुद में पाये जाने वाले Antioxidants  कैंसर जैसी गम्भीर बिमारियों से हमें बचा सकते हैं।
अन्य खाद्य पदार्थों में भिंडी, राजमा, कड़ीपत्ता, पुदिना, रागीकिशमिश  और अखरोट में भी अच्छी मात्रा में Antioxidants पाये गये। 

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

क्या होती हैं रामानुजन संख्याएँ? Ramanujan Numbers

क्या  होती हैं रामानुजन संख्याएँ? Ramanujan Numbers 
रामानुजन संख्याएँ
रामानुजन संख्याउस प्राकृतिक संख्या को कहते हैं जिसे दो अलग-अलग प्रकार से दो संख्याओं के घनों के योग द्वारा निरूपित किया जा सकता है। उदाहरण

  9^3 + 10^3 = 1^3 + 12^3 = 1729.
इसी प्रकार,
        2^3 + 16^3 = 9^3 + 15^3 = 4 104

        10^3 + 27^3 = 19^3 + 24^3 = 20 683

       2^3+ 34^3 = 15^3 + 33^3 = 39 312

       9^3 + 34^3 = 16^3 + 33^3 = 40 033

अतः 1729, 4104, 20683, 39312, 40033 आदि रामानुजन संख्याएं हैं।
1729 से छोटी ऐसी ही संख्या यदि बनानी हो तो उस में एक ऋण संख्या का प्रयोग करना पडेगा परन्तु यदि केवल धनात्मक संख्याओं याने की प्राकृतिक संख्याओं का प्रयोग करना हो तो 1729 सबसे छोटी रामानुजन संख्या है
91 = 63 + (−5)3 = 43 + 33
धनात्मक घन का प्रयोग किया जाए तो 91 रामानुजन संख्या नहीं हो सकती परन्तु पूर्णाको के संदर्भ में 91 सबसे छोटी ऐसी संख्या है गौरतलब है की 91 भी 1729 का एक भाजक है। 
इस 1729 संख्या की भी बहुत बढ़िया कहानी है की 
ब्रिटेन में रामानुजन को  वहां की जलवायु और रहन-सहन की शैली उनके अधिक अनुकूल नहीं थी और उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा। डॉक्टरों ने इसे क्षय रोग बताया। उस समय क्षय रोग की कोई दवा नहीं होती थी और रोगी को सेनेटोरियम मे रहना पड़ता था। रामानुजन को भी कुछ दिनों तक वहां रहना पड़ा। वहां इस समय भी यह गणित के सूत्रों में नई नई कल्पनाएं किया करते थे। जब रामानुजन अस्पताल में भर्ती थे तो डॉ. हार्डी उन्हें देखने आए। डॉ. हार्डी जिस टैक्सी में आए थे उसका नम्बर था 1729 । यह संख्या डॉ. हार्डी को अशुभ लगी क्योंकि 1729 = 7 x 13 x 19 और इंग्लैण्ड के लोग 13 को एक अशुभ संख्या मानते हैं। परंतु रामानुजन ने कहा कि यह तो एक अद्भुत संख्या है। यह वह सबसे छोटी संख्या है, जिसे हम दो घन संख्याओं के जोड़ से दो तरीके में व्यक्त कर सकते हैं। (1729 = 12x12x12 + 1x1x1,और 1729 = 10x10x10 + 9x9x9)