सूर्य
का प्रकाश सात रंगों से मिल बना है जिसे संक्षिप्त में 'बैनीआहपीनाला’ शब्द से याद
रख सकते हैं जब सूर्य की रोशनी की किरण प्रिज्म
से गुजरती है तो सात रंगों में विभक्त हो जाती है। जब हम इंद्रधनुष को देखते हैं, तो वास्तव में एक विशाल और वक्राकार स्पेक्ट्रम को देख रहे होते हैं। इस
स्पेक्ट्रम में बारिश की छोटी-छोटी बूंदें प्रिज्म का काम करती हैं। जब सूर्य की
किरणें बूंद से गुजरती हैं तो ये सात रंगों में विभक्त हो जाती हैं। बूंद के अंदर
स्पेक्ट्रम का आकार बूंद के आकार के बराबर होता है। यहाँ कुछ प्रकाश परावर्तित
होकर बूंद से हर चला जाता है। इस कारण प्रकाश की किरणे विभिन्न रंगों और विभिन्न
दिशाओं में बूंद से हर निकलती हैं। इस विशेषता के कारण इंद्रधनुष तभी दिखाई देता
है जब सूर्य हमारे पीछे हो और बारिश सामने हुई हो। अब इसकी धनुषनुमा आकृति पर गौर
करते हैं कि यह इस रूप में ही क्यों दिखता है? उदाहरण के लिए
लाल रंग लेते हैं। जो बूंदें लाल किरणों को आपकी आँखों की ओर परावर्तित करती हैं वे सभी आपकी आँखों के साथ समान कोण बनाती हैं।
अर्थात् वे सभी इस काल्पनिक क्षैतिज रेखा से बनने वाले शंकु के किनारे पर स्थित
होंगी, जो आपकी आँखों के केन्द्र से गुजरती हो। अन्य रंगो के
साथ भी यह होता है और इसी कारण इंद्रधनुष का आकारा चाप जैसा होता है। यहाँ एक
दिलचस्प बात है कि हर व्यक्ति अपना-अलग इंद्रधनुष देखता है। इंद्रधनुष को कहीं से
भी देखा जा सकता है-झरने के पास,फव्वारे के पास और यहाँ तक
कि आपके शरीर के पास। बस सूर्य की किरणों को पानी की बूंदों पर चमकना चाहिए।
कुछ कीड़े प्रकाश की ओर क्यों आकर्षित होते हैं? why does light attract insects?
प्रकाश से आकर्षित होते कीट
सामान्यतः पौधे व जानवर प्रकाश की
ओर आकर्षित होते हैं।
पौधे में प्रकाशानुवर्तन और गुरुत्वानुवर्तन के गुण होते हैं।
कीटों में भी यह परिघटना प्रकाशानुवर्तन या
प्रकाशानुचलन कहलाती है।
जिसमें पशु व कीड़े/कीट प्रकाश स्त्रोत
की ओर गमन करते हैं।
यदि कीड़े/कीट प्रकाश की ओर जाएँ तब यह
प्रवृत्ति धनात्मक प्रकाशानुचलन एवं कीड़ों का प्रकाश के दूर जाना ऋणात्मक प्रकाशानुचलन
कहलाता है।
अधिकतर कीड़े धनात्मक प्रकाशानुवर्तन
का गुण रखते हैं, किन्तु उनका प्रकाश
के प्रति आकर्षण भिन्न-भिन्न होता है। कुछ कीड़े ऋणात्मक प्रकाशानुवर्तन का गुण
रखते हैं, जैसे खटमल, यह प्रकाश से दूर भागते हैं।
प्रकाश के प्रति कीड़ों की विभिन्न
प्रजातियों का भिन्न-भिन्न व्यवहार, उनके
विशिष्ट लक्षणों के कारण होता है।
कुछ कीड़े बिना आँखो के भी
प्रकाशानुवर्तन का गुण प्रदर्शित करते हैं।
प्रकाश के प्रति इन कीड़ों की
संवेदनशीलता इनकी पृष्ठीय सतह के कारण होती हैं। उचित कीड़े प्रकाश किरणों के प्रति
अत्याधिक संवेदनशील होते हैं।
उनकी सतह कोशिकाएँ व आँखे,
उनकी प्रकाश स्त्रोत के
प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाती हैं।
कुछ कीड़े पीले व मरकरी प्रकाश
क्षेत्र के प्रति आकर्षित होते हैं।
प्रकाशमय क्षेत्र मादा द्वारा जोड़ा
बनाने में भी उपयोग किया जाता है। वयस्क दीमक के असंख्य जोड़े प्रकाशानुवर्तन प्रकट करते हैं और मारे जाते हैं बस चंद ही जोड़ा बनाने में कामयाब होते हैं।
क्या वर्षा जल शत प्रतिशत शुद्ध होता है? Is Rain Water is 100% Pure?
आदीवासी एकत्र करते हैं वर्षा का जल
क्या वर्षा जल शत प्रतिशत
शुद्ध होता है? क्या इसे हम पेय-जल के तौर पर
उपयोग कर सकते हैं?
प्राकृतिक जल में आयन घुले
होते हैं।
वर्षा जल प्राकृतिक आसवन
प्रक्रिया, जो कि वाष्पीकरण, संघनन एवं अवक्षेपण की सम्मिलित क्रिया है, से
प्राप्त होता है, वर्षा जल बहुत ही तनु विलयन होता है।
जिसमें बहुत ही कम मात्रा,
सामान्यतः 10 से 20 मि.ग्रा.
प्रति लीटर में आयन घुले रहते हैं। वर्षा जल में सभी घुलित आयन 1 से 3 मि.ग्रा. / लीटर की परास में होते हैं। इसलिए यह शुद्ध व पेय योग्य होता
है। इस वर्षा जल का पी एच मान 6.7 से 7.2 उपभोग की दृष्टि से सही माना जाता है, जो कि क्षेत्र
के अनुसार परिवर्तित होता है। तटीय क्षेत्र में समुद्री फुहार के कारण आयन उच्च मात्रा में विलेय होते हैं।
pH व T D S
हवा में अधिक कणों की उपस्थिति, पानी के अणुओं से क्रिया कर अधिक आयनों को घोलती है। वायु में कार्बनडाइऑक्साइड, नाइट्रोजनडाइऑक्साइड
एवं सल्फरडाइआक्साईड की अधिक मात्रा से अम्लीय वर्षा होती है जो कि पेड़-पौधों के
लिए हानिकारक है। इस वर्षा से पी एच pH मान भी घटता है।
शुद्ध वर्षा जल शरीर के लिए आवश्यक खनिज तत्वों व आयनों की पर्याप्त मात्रा नहीं
रखता। इसलिए वर्षा जल में उचित परिवर्तन करने के पश्चात, पेयजल
के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है। वर्षा का जल आरम्भिक बूंदों के साथ वातावरणीय अशुद्धियों युक्त होता है परन्तु कुछ देर की लगातार वर्षा के बाद जल अपेक्षाकृत शुद्ध अवस्था में होता है। ओधोगिक नगरी जैसे आगरा कानपुर फरीदाबाद आदि और वायु प्रदुषित शहर में वर्षा का जल अम्लीय प्रकृति का होता है।
क्या?? आने वाला है मलेरिया को रोकने वाला टीका Malaria Vaccine
पूरे विश्व में प्रतिवर्ष लगभग सात लाख मानवमलेरिया के कारण असमय मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
इस रोग का इतिहास बताता है कि आबादी की आबादी खत्म की है इसने, इसका उपाय
सर्वप्रथम डी.डी.टी.के रूप में समक्ष आया।
पूरी दुनिया में लाखो टन डी.डी.टी. का छिड़काव किया गया, कईं देशो में अलग से
मलेरिया उन्मूलन विभाग बनाए गए लेकिन डी.डी.टी.के रूप में मिला उपाय भी मलेरिया के
उन्मूलन में सफल ना हो सका वरन् डी.डी.टी. अन्य कईं पर्यावरणीय समस्याएं ले कर पेश
आया। मलेरिया पर दवा के विकास का इतिहास को देखा जाए तो विश्व में मलेरिया
के विरूद्ध टीके विकसित किये जा रहे है यद्यपि अभी तक 100% सफलता नहीं मिली है। पहली बार प्रयास 1967 में चूहों
पर किया गया था जिसे जीवित किंतु विकिरण से उपचारित बीजाणुओं का टीका दिया गया।
इसकी सफलता दर 60% थी। उसके बाद से ही मानवों पर ऐसे प्रयोग
करने के प्रयास चल रहे हैं। वैज्ञानिकों ने यह निर्धारण करने में सफलता प्राप्त की
कि यदि किसी मनुष्य को 1000 विकिरण-उपचारित संक्रमित मच्छर
काट लें तो वह सदैव के लिए मलेरिया के प्रति प्रतिरक्षा विकसित कर लेगा।इस धारणा पर वर्तमान में
काम चल रहा है और अनेक प्रकार के टीके परीक्षण के भिन्न दौर में हैं। एक अन्य सोच
इस दिशा में है कि शरीर का प्रतिरोधी तंत्र किसी प्रकार मलेरिया परजीवी के बीजाणु
पर मौजूद सीएसपी (सर्कमस्पोरोज़ॉइट प्रोटीन) के
विरूद्ध एंटीबॉडी बनाने लगे।इस सोच पर अब तक सबसे ज्यादा टीके बने तथा परीक्षित किये गये हैं। SPf66 पहला टीका था जिसका क्षेत्र परीक्षण हुआ, यह शुरू
में सफल रहा किंतु बाद मे सफलता दर 30% से नीचे जाने से असफल
मान लिया गया। आज RTS,S/AS02Aटीका परीक्षणों में
सबसे आगे के स्तर पर है।आशा की जाती है किपी. फैल्सीपरमके जीनोम की पूरी कोडिंग मिल जाने से नयी दवाओं का तथा टीकों का विकास एवं
परीक्षण करने में आसानी होगी।
मलेरिया का टीका खोजना डॉक्टरों के लिए हमेशा से ही एक बड़ी
चुनौती रहा है।दुनिया भर के वैज्ञानिक
मलेरिया उन्मूलन का कोई कारगर उपाय खोजने में लगे रहे बहुत से रासायनिक और गैर-रासायनिक
मलेरिया उन्मूलन के तरीको पर काम हुआ तब जाकर अब मलेरिया से निबटने का उपाय यानि
हथियार वैज्ञानिकों के हाथ लगने वाला ही है। ब्रिटेन
के वैज्ञानिकों ने मलेरिया रोकने का टीका लगभग विकसित कर ही लिया है।
इन ब्रिटिश वैज्ञानिकों को इस टीके के पूर्व परिणामों में पूर्ण सफलता मिली है यह
टीका मलेरिया परजीवी की सभी प्रजातियों जैसे प्लाज्मोडियम वाईवेक्स, प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम, प्लाज्मोडियम मलेरियाई और
प्लाज्मोडियम ओवेल पर कारगर होगा परन्तु अभी यह शोध प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम पर
केंद्रित है।प्लाज्मोडियम
फैल्सीपरमके
जीनोम की पूरी कोडिंग मिल जाने से नयी दवाओं का तथा टीकों का विकास एवं परीक्षण
करने में तेज़ी आयी।ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के जेनर इंस्टीटयूट के डॉ़ सिमोन ड्रापर की अगुवाई
में वैज्ञानिकों की एक टीम ने अब एक ऐसा टीका विकसित किया है जो शरीर में खासतौर
पर प्लाज्मोडियम फाल्सिपरम को निष्क्रिय कर देता है।
मलेरिया परजीवी
रक्त की लाल रक्त कणिकाओं में प्रवेश करके तीव्र गुणित होता है और फिर बीमारी को
जन्म देता है। शोध दल के वैज्ञानिकों ने जो तरीका अपनाया वो था कि सर्वप्रथम उस
प्रोटीन को पहचनाना जो मलेरिया परजीवी को लाल रक्त कणिकाओं तक पहुचने को आसान
बनाता है। प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम परजीवी लाल रक्त कणिकाओं की सतह पर ‘बासिजिन’
नामक प्रोटीन को चुनता है और इस प्रोटीन के साथ ‘आर.एच.-5’ प्रोटीन को जोड़ देता है। इस क्रिया में लाल रक्त कणिकाओं में उसके लिए
प्रवेशद्वार खुल जाता है जहां वह तीव्र गुणित होकर मलेरिया रोग को प्रकट करता है।
वैज्ञानिकों ने इस
प्रक्रिया को रोकने के तरीकों पर काम किया और सफलता मिली, ‘आर.एच.-५’ प्रोटीन के
विरुद्ध एंटीबॉडीज को प्रेरित कर के इस रोग को प्रकट होने से पहले ही रोकने में
सफलता प्राप्त कर ली है।
ब्रिटिश वैज्ञानिकों का यह सफल शोध नेचर कम्यूनिकेशन पत्रिका में छपा है। मलेरिया
का टीका 2015 तक बाजार में आ जायेगा। यह भरोसा अणु जीव वैज्ञानिक डॉ. जो कोहेन
ने दिलाया है। 68 वर्षीय इस मृदुभाषी वैज्ञानिक के पास मलेरिया के टीके का पेटेंट है। इस पर उन्होंने इसी सप्ताह तीसरे चरण का
परीक्षण पूरा कर दिया है। उनका दावा
है कि इसके टीकाकरण से पांच से लेकर 17 महीने के शिशुओं में 56
फीसद तक मलेरिया की रोकथाम में सफलता मिली है। इस दवा को गंभीर बीमारी के दौरान तीन खुराक देने पर 47 प्रतिशत सफलता हासिल हुई है।
इसका परीक्षण सब सहारा क्षेत्र के सात देशों में किया गया है। ये सारे परीक्षण टीके को बाजार में उतारने से पहले हो गये
बताये जाते है। और इसके प्रभावों को
कुछ माह के शिशुओं से लेकर बड़े बच्चों तक पर अच्छी तरह परखा जा चुका है।अगले दो से तीन साल में इंसानों
पर भी इस टीके का इस्तेमाल शुरू करने की योजना है।
नोट: यह लेख कोई विशेषज्ञ लेख नहीं है मात्र जानकारी है।
पुंस्तनबृद्धि Gynecomastia ग्य्नेकोमस्टिया
पुरुष स्तन वृद्धि
पुंस्तनवृद्धि या पुरुष स्तन वृद्धि उस स्थिति को कहते है जब पुरुष की स्तन ग्रन्थिया वृधि को प्राप्त होने लगती हैं इस अवस्था में पुरुष के स्तन समान्य से बड़े होने लगते हैं ।
Gynecomastiaका उद्गम एक ग्रीक शब्द से है यह मेडिकल साइंस का शब्द है जिस का समान्यतः मतलब है महिला जैसी छातियाँ “woman-like breasts"
नवजात शिशुओं में यदि यह लक्षण हों तो इसका कारण माँ से प्राप्त महिला हार्मोन हैं और यदि यह लक्षण किशोरावस्था में और प्रौढ़/बुजुर्ग अवस्था में हों तो यह एक असामान्य बीमारी या चयापचय संबंधी विकार के साथ जुड़े हालत होते हैं ।
मोटापा भी पुरुष स्तन वृद्धि का एक कारण हैं, इसके और भी बहुत से कारण हो सकते हैं । बचपन, किशोर व युवा अवस्था में यह पुंस्तनवृद्धि लज्जा और हीनभावना का कारण बनती है ।समुद्रतट पर नहाना या सार्वजनिक स्थानों पर निवस्त्र होना शर्मनाक स्थिति पैदा करता है ।ज्यादातर लड़कों में जिनमे पुंस्तनवृद्धि की वजह मोटापा नहीं है उनमे स्तनों की वृद्धि वयस्कता की आयु तक पहुँचते तक बिना कोई उपचार के साथ अपने आप ही दूर (सिकुड़ ) हो जाती है ।
पुंस्तनवृद्धि के प्रकार
पुंस्तनवृद्धि के कारण सामान्यतः पुंस्तनवृद्धि के कारण अभी तक अनिश्चित माने जाते हैं ।
संक्षेप में,
स्वास्थ्य की स्थिति सही ना होना।
पुरुष हारमोन की कमी।
बढ़ती उम्र।
वृष्ण,अधिवृक्कग्रंथि, पियूष ग्रंथि में ट्यूमर का होना।
गुर्दे की विफलता।
अवटू ग्रंथि की अतिसक्रियता।
यकृत की विफलता और सिरोसिस।
कुपोषण और भुखमरी।
सहवास के निष्क्रियता व अतिसक्रियता दोनों।
कई स्वास्थ्य स्थितियां हार्मोन के स्तर को प्रभावित कर पुंस्तनबृद्धि पैदा करती है व्यक्तिगत मामलों के लिए एक मूल कारण निर्धारित नहीं किया जा सकता है कुछ खास व आम कारण यहाँ वर्णित हैं ।
नर जनन हारमोन टेस्टोस्टेरॉन का निम्न स्तर।
एक स्थिति में यह छाती पर मादा - हार्मोन संबंधी और नर - हार्मोन संबंधी प्रभाव के असंतुलन के कारण भी हो सकता है।
सेक्स हार्मोन बाध्यकारी ग्लोब्युलिन (SHBG) की अधिकता मुक्त टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन के स्तर को निम्न करता है।
10% से कम मामलों में दवा के साइड इफेक्ट पुंस्तनवृद्धि के कारण के लिए बदनाम हैं।
ऐसी ही एक दवा Spironolactone (Aldactone) है जिस के साइड इफेक्टस ऐसे पाए गए हैं।
एल्कोकल यानी की शराब का अत्याधिक सेवन हार्मोनल गडबडियां उत्त्पन्न करता है मादा हारमोन एस्ट्रोजन की अधिकता के कारण छातियों में महिला के लक्षण दिखाई देते हैं पुरुष की छात्तियाँ अधिक वसा का संचय करती हैं और वह मनुष्य असहज महसूस करता है।
एक कारण मोटापा भी माना गया है पुंस्तनवृद्धि का परन्तु हमेशा यह कारण पुंस्तनवृद्धि का नहीं हो सकता है क्यूंकि कम मोटे और बिलकुल मोटे नहीं आदमियों में भी पुंस्तनवृद्धि के लक्षण पाए जाते है और किशोरावस्था में तो बिना मोटापे के लक्षण वाले लड़कों में स्तन-वृद्धि प्रदर्शित होती है।
आक्सीटोसिन नामक हारमोन जो कि गाय-भैंस का दूध उतारने के लिए दक्षिण एशिया देशों में बहुतायत में प्रयोग होता है इस इंजेक्शन के बेल वाली सब्जियों में तीव्र वृद्धि के लिए भी प्रयोग किये जाने से मनुष्यों में हारमोन असंतुलन बढ़ गया है जिस में मादा में तो द्वितियिक लैंगिक लक्षण जल्दी दिखने लगते हैं और साथ-साथ नरों में भी मादा के द्वितियिक लक्षणों का प्रदर्शन होता है।
व्ययाम, शारीर सौष्ठव निर्माण, तैराकी, बैंच प्रेस भारोत्तोलन, मासपेशीय उठान ड्रग्स और प्रोटीन व स्टेरोय्ड्स युक्त खाद्य भी इस समस्या के जनको में से एक हो सकते हैं।
पुंस्तनवृद्धि के प्रकार सामान्यतः पुंस्तनवृद्धि के दो-तीन प्रकार हैं,
सबसे अधिक तो उभरे हुए गद्देदार चूचक प्रकार की पुंस्तनवृद्धि पायी जाती है और दूसरा प्रकार जो कि आम नहीं है परन्तु पुंस्तनवृद्धि का शुद्ध रूप है वो है स्तन ग्रंथियों के उत्तको का विकास हो जाना।
पुरुष स्तन कैंसर के कारण छातियों का उभर जाना।
पुंस्तनवृद्धि के उपचार
किशोरावस्था में तो यह स्वत ही दूर हो जाती है।
इसके अलावा पुंस्तनवृद्धि के दो प्रमुख उपचार हैं,
१. लिपोसक्शन
२. शल्य चिकित्सा।
यहाँ आप शल्य चिकित्सा का विडियो देख सकते हैं (कृपया यह विडियो आप को व्यथित भी कर सकता है)
क्यों जरूरी है विटामिन ई ? Why Vitamin-E is essential ?
विटामिन-ई अणु
आवश्यक शारीरिक क्रियाएँ पूरी करने के लिए शरीर को किसी न किसी रूप में सभी विटामिनो की जरूरत होती है। क्योंकि विटामिनो की कमी से शरीर में कई दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं। यूँ तो सभी विटामिनो का अपना अपना महत्व है परन्तु इनमे से विटामिन ई अद्वितीय गुणों से भरपूर है। अधिकतर यह ही जानते हैं कि झुर्रियों को रोकने में और नपुसंकता/बांझपन मे विटामिन ई लाभकारी है परन्तु सिर्फ ऐसा नहीं है माल बेचने की जुगतों ने इस महत्वपूर्ण विटामिन को केवल सेक्स और सौंदर्य विटामिन बना कर पेश किया है। वैज्ञानिकोंकादावाहैकिविटामिन ईअल्जाइमर रोगकोरोकनेमेंसहायक हो सकता है। तो आइए जानें विटामिन ई के और उसके कार्यों के बारे में; विटामिन ई सब उम्र के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक एंटीऑक्सीडेंट प्रकार का विटामिन है और व्यायाम खेल-कूद से उत्पन्न हो सकने वाली आक्सिकरणीय नुकसान को रोकने में मदद करता है।विटामिन ईद्वारा मुक्त एंटीऑक्सीडेंट गुणों के कारण इसआक्सिकरणीय नुकसान मे कोशिकाओं को सामान्य रूप से कार्य करने के लिए पूरी क्षमता के साथ प्रेरित करता हैं और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया, कैंसर और हृदय रोग सहित कई विभिन्न स्वास्थ्य स्थितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए जिम्मेदार माना जाता है।विटामिन ई सभी मांसपेशियों में ऐंठन को कम करने में मदद कर सकते हैं। विटामिन ई कई रूपों मौजूद हैं: अल्फा-tocopherol ; डी-अल्फा tocopherol(प्राकृतिक उत्पाद सोयाबीन तेल); डी-अल्फा tocopheryl; डीएल-अल्फा tocopheryl; सिंथेटिक विटामिन ई; प्राकृतिक अल्फा, बीटा, डेल्टा, और गामा tocopherol सहित समावयवों का एक मिश्रण है। विटामिन ई की कमी या अल्पता से हानियाँ; >विटामिन ई, खून में रेड बल्ड सेल या लाल रक्त कणिकाओं (R B C) को बनाने के काम आता है। >शरीर में अनेक अंगों को सामान्य रूप में बनाये रखने में मदद करता है जैसे कि मांस-पेशियां, अन्य उत्तक।
>यह विटामिन शरीर को आक्सीजन के एक नुकसानदायक रूप से बचाता है जिसे आक्सीजन रेडिकल्स(oxygen radicals) कहा जाता है येएंटीओक्सिडेंट (anti-oxidants) के रूप में हमे इस नुकसान से बचाता है ।
>विटामिन ई , कोशिका के अस्तित्व बनाए रखने के लिये कोशिका की बाह्य झिल्ली को बनाए रखता है।
>विटामिन ई, शरीर के वासिय अम्लो को भी संतुलन में रखता है।
>समय से पहले हुये या अपरिपक्व नवजात शिशु (Premature infants) में विटामिन ई के कमी से खून की कमी हो जाता है। इससे उनमें एनिमीया (anemia) हो सकता है।
>बच्चों और व्यस्क लोगों में विटामिन ई के अभाव सेदिमाग की नसों की या न्युरोलोजीकल (neurological) समस्या हो सकती है।
>पुरुषों की नपुंसकता और नामर्दी का एक कारण शरीर में विटामिन ई की कमी हो जाना भी होता है।
>शिराओं के भंयकर घाव, गैग्रीन आदि विटामिन `ई´ के प्रयोग से समाप्त हो जाते है।
>विटामिन `ई´ की कमी से स्त्री के स्तन सिकुड़ जाते हैं और छाती सपाट हो जाती है।
>विटामिन `ई´ की कमी से थायराइड ग्लैण्ड तथा पिट्यूटरी ग्लैण्ड के कामकाज में बाधा उत्पन्न हो जाती है।
>शरीर में विटामिन `ई´ की कमी हो जाने से किसी भी रोग का संक्रमण जल्दी लग जाता है। >विटामिन `ई´ की कमी होते ही क्रमश: विटामिन `ए´ भी शरीर से नष्ट होने लगता है। >विटामिन `ई´ झुर्रियाँ मिटाने और युवा बनाये रखने में विशेष सहायक होता है।
विटामिन ई की उपलब्धता
विटामिन ई की उपलब्धता; विटामिन-ई सिर्फ प्राकृतिक स्त्रोत से ही लेने पर फायदेमंद है।विटामिन बी और सी पानी में घुलनशील है और यूरिन के जरिए बाहर चला जाता है, लेकिन विटामिन ए, डी और इ फैट सॉल्युबल हैं,ये शरीर में रह जाते हैं। विटमिन ई सी फूड, शाक-सब्जियों, अंकुरित अनाज, बिनोले, एवोकैडो, मेवे व राजमा, फ्लेक्स सीड(अलसी), सोयाबीन, लोबिया में पाए जाते हैं...ओमेगा 3 फैट्स सिर्फ ऑयली मछली जैसे सालमन में पाए जाते हैं।। यह गेहूँ के अंकुर के तेल (wheat germ oil) से भी प्राप्त होता है।
Mustard Greens,Swiss Chard, Spinach, Kale and Collard Greens,Nuts,Tropical Fruits, Red Bell Peppers, Broccoli, Wheat Oils
जीवन रक्षक न होते हुए भी विटामिन ईसंसार भर के स्त्री-पुरुषों के लिए जीवन के समस्त आनन्द प्राप्त करने के लिए अति आवश्यक है।
रक्तदान का शरीर से निकाल कर जरूरतमंद व्यक्ति को देना रक्तदान कहलाता है बशर्ते इसके बदले कोई धन पुरस्कार आदि ना लिया जाए या रक्तदान तब होता है जब एक स्वस्थ व्यक्ति स्वेच्छा से अपना रक्त देता है रक्तदान सही मायनों मे जीवनदान ही है। हमारे द्वारा किया गया रक्त का दान कई लोगो की जान बचाता है। इस बात का अहसास हमें तब होता है जब हमारा कोई अपना खून के लिए जिंदगी और मौत के बीच जूझता है। उस वक्त हम नींद से जागते हैं और उसे बचाने के लिए खून के इंतजाम की जद्दोजहद करते हैं।देश भर में रक्तदान हेतु नाको, रेडक्रास, पंजीकृत ब्लडबैंक, सेना हस्पताल जैसी कई संस्थाएँ लोगों में रक्तदान के प्रति जागरूकता फैलाने का प्रयास कर रही है परंतु इनके प्रयास तभी सार्थक होंगे, जब हम स्वयं रक्तदान करने के लिए आगे आएँगे और अपने मित्रों व रिश्तेदारों को भी इस हेतु आगे आने के लिए प्रेरित करेंगे।
जीवन बचाने के लिए खून चढाने की जरूरत पडती है। दुर्घटना, रक्तस्त्राव, प्रसवकाल और ऑपरेशन आदि अवसरों में शामिल है,जिनके कारण अत्यधिक खून बह सकता है और इस अवसर पर उन लोगों को खून की आवश्यकता पडती है। थेलेसिमिया, ल्यूकिमिया, हीमोफिलिया जैसे अनेंक रोगों से पीडित व्यक्तियों के शरीर को भी बार-बार रक्त की आवश्यकता रहती है अन्यथा उनका जीवन खतरे में रहता है। जिसके कारण उनको खून चढाना अनिवार्य हो जाता है
स्वैच्छिक रक्तदान में केवल 450 मिलीलीटर रक्त निकाला जाता है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के मुताबिक आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि 450 मिली खून तीन जिन्दगियों को बचा सकता है। सही समय पर रक्त न मिलने की वजह से प्रति वर्ष देश में बहुत सारे जरूरतमंदों की मौत हो जाती है। सड़क दुर्घटना, गर्भावस्था से गुजर रही महिलाएं, बड़ी सर्ज़री वाले मरीज, कैंसर के शिकार व्यक्तियों व थैलीसीमिया के शिकार बच्चों को सुरक्षित रक्त की बेहद आवश्यकता होती है।
रक्त से रक्त अवयवों को अलग कर जरूरतमन्द मरीजों को चढ़ाने से रक्त की बचत होती है, जो इस देश के लिए आवश्यक है । एक यूनिट ब्लड से कई अवयव तैयार किए जा सकते हैं, जैसे- लाल रक्तकणिकाएं, प्लेटलेट्स, प्लाज्मा आदि। किसी मरीज को केवल वही अवयव चढ़ाया जाता है जिसकी उसे जरूरत होती है।
रक्तदान के फायदे बीएल कपूर मेमोरियल अस्पताल के ट्रांसफ़्यूजन मेडिसीन विभाग की डॉ. रसिका सेतिया के अनुसार स्वैच्छिक रक्तदान से फायदे ही फायदे हैं । उनके अनुसार रक्तदान करके न सिर्फ किसी की ज़ि़न्दगी बचाने जैसी अनमोल खुशी मिलती है बल्कि इससे हमारी सेहत को भी लाभ पहुंचता है। *दिल के रोगों की संभावना कम होती है-यह पाया गया है की खून में लौह तत्व का स्तर बढ़ने पर हृदय रोग की संभावना बढ़ जाती है। नियमित तौर पर रक्तदान करने से फालतू लौह तत्व शरीर से बाहर (खासकर पुरुशों के मामले में) चला जाता है। इस प्रकार हृदयाघात का जोखिम एक तिहाई तक कम हो जाता है। * नई लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन बढ़ता है- रक्तदान करने वाले व्यक्ति के शरीर से खून निकल जाने पर लाल रक्त कोशिकाओं में कमी आ जाती है। इनकी पुन: पूर्ति के लिए हमारी मज्जा तुरन्त नई कोशिकाओं के उत्पादन में लग जाती है और इस तरह हमारा खून स्वच्छ व नया हो जाता है। *कैलोरी घटती है-नियमित तौर पर रक्तदान करके आप फिट रह सकते हैं। 450 मिली रक्तदान करने से आप अपने शरीर की 650 कैलोरी कम कर सकते हैं। *प्राथमिक रक्त परीक्षण हो जाता है- इन सब फायदों के साथ रक्तदाता के खून का एक छोटा सा परीक्षण (रक्तदान के पूर्व व पश्चात्) भी हो जाता है। इसमें शामिल होते हैं- ऐचआईवी, ऐचबी स्तर की जांच, रक्तचाप, शरीर का वजन आदि। रक्तदान से यूरिक अम्ल और केलस्ट्रोल की मात्रा भी नियंत्रित रहती है।
LOWER IRON LEVELS,Reduce the chance of heart diseases,Enhance the production of new Red Blood Cells,REPLENISH BLOOD'Helps in fighting hemochromitosis,Burns calories,Basic blood test is done & REDUCE CANCER RISK
कौन कौन कर सकता है रक्तदान :
जिसकी आयु 18 से 65 वर्ष के बीच हो। जिसका वजन (100 पौंड) 48 किलों से अधिक हो। जो क्षय रोग, रतिरोग, पीलिया, मलेरिया, मधुमेंह, एड्स आदि बीमारियों से पीडित नहीं हो। जिसने पिछले तीन माह से रक्तदान नहीं किया हो। रक्तदाता ने शराब अथवा कोई नशीलीदवा न ली हो। गर्भावस्था तथा पूर्णावधि के प्रसव के पश्चात शिशु को दूध पिलाने की 6 माह की अवधि में किसी स्त्री से रक्तदान स्वीकार नहीं किया जाता है।