बुधवार, 10 अप्रैल 2013

क्यों आती है हमें जंभाई/उबासी? What is Yawn?



क्यों आती है हमें जंभाई/उबासी? What is Yawn?
हमे जब ऊब होती है या नींद का अनुभव होता है तो हम उबासी लेते हैं? निश्चित रूप से आपने भी ऐसा किया होगा! क्या आपने कभी गौर किया है कि किसी को उबासी लेते देख आसपास के लोग भी उबासी लेने लगते हैं? उबासी लेने का यह एक सिद्धांत है। किसी को उबासी लेते देखकर, किसी फोटोग्राफ को देखकर या उसके बारे में पढ़कर और यहां तक कि उबासी के बारे में केवल सोचकर भी हमें उबासी सकती है।
जंभाई/उबासी क्या है ?
तकनीकी रूप से उबासी एक परिवर्ती क्रिया है, जिसमें गहरी सांस लेने के बाद मुंह खुलता है ऑक्सीजन का धीमा निर्मोचन होता है। यह व्यवहार अनैच्छिक नियंत्रण के अधिक होता है तथा इसे नियंत्रित नहीं किया जा सकता या इसे दबाया नहीं जा सकता है। इसलिए जब आप उबासी लेने वाले हों तो आप उसे पूरा कर ही लें अन्यथा कईं बार जबड़े जकड़ सकते हैं यह स्थिति बहुत दर्दभरी हो जाती है और शर्मनाक भी।
क्यों लेते हैं हम जंभाई/उबासी?
भले ही उबासी एक इतनी सामान्य क्रिया है कि आप उबासी लेते हैं, आपका कुत्ता, आपकी बिल्ली भी उबासी लेती है- पर मुंह का इतना बड़े आकार में खुलने का कारण अभी भी पूरी तरह से ज्ञात नहीं है। उबासी के बारे में कई सिद्धांत हैं। जैसे कि ऊब होने से, थकावट होने से और किसी और को ऐसा करते हुए देखने से। पहले उबासी को मानव तथा प्राइमेट में- जैसे कि लंगूर तथा चिंपाजी में जैविक प्रणाली के रूप में माना जाता है, जो मस्तिष्क को अधिक गर्म होने से बचाती है।
जंभाई/उबासी चौकन्ना बनाती है जी
सबसे लोकप्रिय मान्यता है कि यह एक श्वशन परिवर्ती क्रिया है, जो रक्त में कार्बन डाइऑक्साइड तथा ऑक्सीजन के स्तरों का नियंत्रण करती है। माना जाता है कि जब आपकी सांस छिछली होती है और फेफड़ों में ऑक्सीजन की आपूर्ति कम हो जाती है, तो अचानक ली हुई उबासी से ऑक्सीजन का आपूर्ति होती है और आपकी हृदय गति की दर बढ़ जाती है। यह फेफड़ों तथा रक्त से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाती है और रक्त वाहिकाओं द्वारा मस्तिष्क में ऑक्सीजन की आपूर्ति करती है, और सामान्य श्वसन फेफड़े का वातन बनाए रखती है।
इसके परिणावस्वरूप व्यक्ति की चौकसी बढ़ जाती है। पर यह सिद्धांत पर्याप्त और सर्वमान्य नहीं है, क्योंकि यह इस बात का सपष्टीकरण नहीं करता कि आखिर जिस व्यक्ति के रक्त में ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा होती है, वह भी क्यों उबासी लेते हैं?
क्या जंभाई/उबासी हमारे लिए किसी तरह से फायदेमंद है ?
गर्भस्थ भी लेता जंभाई/उबासी
एक दूसरा सिद्धांत है कि उबासी फेफड़ों और उसके ऊतकों को फैलाती है। कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि उबासी एक रक्षात्मक परिवर्ती क्रिया है, जो तेल जैसे पदार्थ जिसे सर्फेक्टेंट कहते हैं, को पुनर्वितरित करती है, जो फेफड़ों को स्नेहित करता है और उसे खराब होने से बचाता है। इसका अर्थ है कि यदि हम उबासी करें, तो गहरी सांस लेना कठिन हो जाएगा इसलिए अगली बाद जब कोई उबासी लेता दिखाई पड़े, तो आपको उनसे बचने की जरूरत नहीं है। समझिए कि वे अपने रक्त में ऑक्सीजन नियंत्रित कर रहे हैं या अपने फेफड़ों का व्यायाम कर रहे हैं ! उबासी लेना स्वास्थयवर्धक है और अनैच्छिक क्रिया का आवश्यक भाग भी, तो आओ फिर उबासी लें 
पशु पक्षी भी लेते है देखों 
 

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

क्यों आती है हमें हिचकी ? What is hiccups?

क्यों आती है हमें हिचकी ? What is  hiccups?
हिचकी एक ऐसी स्थिति है, जिसमें सांसों को अनिच्छापूर्वक अंदर लिया जाता है। जब आपका डायफ्राम अधिक सक्रिय हो जाता है, यह तब उत्पन्न होता है। आपका डायफ्राम एक ऐसी मांसपेशी है, जो आपके फेफड़ों को संकुचन तथा फैलने में मदद करती है। कई बार यह काफी चिढ़ पैदा करने वाली और झटके उत्पन्न करने वाली चीज़ हो जाती है। झटके आने से आप अचानक सांस अंदर लेते हैं और हिचकी पैदा होती है, क्योंकि आपका स्वर-बॉक्स हवा अंदर जाने के लिए शीघ्रता से नहीं खुल पाता है।

हिचकी सामान्यतः एक लय के साथ पैदा होती है, जहां दो हिचकियों के बीच का समय अंतराल लगभग समान रहता है।
यद्यपि अधिकतर विशेषज्ञ हिचकी के बारे में एकमत नहीं हैं कि वे क्यों आती हैं, पर सामान्यतः वे सभी ये मानते हैं कि इसका एक कारण पेट में कोई हल्की गड़बड़ी है। कभी-कभी हिचकियों को शारीरिक की बजाए मनोवैज्ञानिक माना जाता है, पर वास्तव में इसके निश्चित कारण का पता नहीं चल पाया है। कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि हिचकियां सांस लेने वाली पेशियों नियंत्रण वाली तंत्रिकाओं की कोई गड़बड़ी होती है।
हिचकी का क्या उपयोग है ?
इसका पता नहीं लगाया जा चुका है कि हिचकी से शरीर को क्या फ़ायदा होता है। पर यह माना जाता है कि यह जंतुओं को भोजन निगलने में मदद करती है जो उनके गले में फंस जाते हैं। जो जंतु चौपाये होते हैं, उन्हें अपने भोजन को मुंह से पेट में लाने के लिए अपने भोजन को स्थांतरित करना होता है, जिसका मतलब यह हुआ कि गले में भोजन का चिपकना आसान हो जाता है। कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि वे भोजन खंड के फंसने से तंत्रिका पर दबाव पड़ता है और हिचकी पैदा हो जाती है।
हिचकी कितनी देर तक जारी रहती है ?
हिचकी कुछ मिनटों से लेकर, कुछ घंटों, दिन और यहां तक कि कुछ दिनों तक जारी रह सकती है। अधिकांश समय में यह कुछ मिनटों तक रहती हैं और बिना किई उपचार के गायब हो जाती है। हिचकी के कई वर्ग होते हैं, उनकी लंबाई पर निर्भर करते हैं। जहां सामान्य हिचकी घंटे भर के भीतर गायब हो जाती है, निरंतर रहने वाली हिचकी 48 घंटों तक जारी रह सकती है, पर ये सामान्यतः हानिरहित होती हैं। तीक्ष्ण हिचकी 48 घंटों से अधिक तक जारी रह सकती है। हिचकी यदि दो महीनों से अधिक समय के लिए जारी रहे तो उन्हें इंटरैक्टेबल या डायबोलिक हिचकी कहते हैं, और यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत होता है।
हिचकी से कैसे छुटकारा पाएं ?
हिचकी से मुक्ति पाने के कई सुझावों के बीच एक है- कुछ मीठा खाना तथा पानी पीना। चूंकि हिचकी वायु अवरुद्धता से जुड़ी होती है, इसका सबसे अच्छा उपचार है अपनी सांस को रोकते हुए उसपर नियंत्रण रखना या गहरी सांस लेना।खूब सारा पानी पिएं।” “चीनी खाएं।” “अपनी सांस को रोक कर रखें।” “उफ्फ!!

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

क्या है स्वाइन फ्लू? What is Swine Flu?

क्या है स्वाइन फ्लू? What is Swine Flu?स्वाइन फ्लू एक घातक वायरस जनित रोग है, जो सूअरों से फैला है। सबसे पहले इस बीमारी के लक्षण मैक्सिको के वेराक्रूज इलाके के एक पिग फार्म के आसपास रह रहे लोगों में पाए गए थे। स्वाइन फ्लू दरअसल सुअरों के बुखार को कहते हैं जो कि उनकी सांस से जुड़ी बीमारी है। ये जुकाम से जुड़े एक वायरस से पैदा होती है। ये वायरस मोटे तौर पर चार तरह के होते हैं। H1N1, H1N2, H3N2 और H3N1। इनमें H1N1 सबसे खतरनाक है और दुनियाभर में यही वायरस सबको अपनी चपेट में ले रहा है।
इंसानों में फैलने की संभावनाए
यूं तो आमतौर पर इसके वायरस इंसानों में नहीं फैलते लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक ये बीमारी इंसानों से इंसानों के बीच भी अब फैलने लगी है। ये वायरस उन लोगों में फैल सकता है, जो सुअरों के सीधे संपर्क में रहते हैं।
स्वाइन फ्लू के लक्षण क्या हैं?
इसके लक्षण आम मानवीय फ़्लू से मिलते जुलते ही हैं। बुखार, सिर दर्द, सुस्ती, भूख न लगना और खांसी। कुछ लोगों को इससे उल्टी और दस्त भी हो सकते हैं। सबसे पहले जरूरी है कि स्वाइन फ्लू के लक्षण और इससे बचाव के तरीकों को जानने की। स्वाइन फ्लू के लक्षण यूं तो आम फ्लू की तरह ही होते है। स्वाइन फ्लू का वायरस सूअर से फैलता है। इसमें पहले पीड़ित शख्स का गला खराब होता है और फिर खांसी के बाद तेज बुखार हो जाता है। मरीज को पेट में दर्द जैसी शिकायत भी होती है। अगर वक्त पर इलाज न हो तो फिर मरीज की हालत धीरे-धीरे खराब होने लगती है और देर होने पर दवाओं का असर भी खत्म हो जाता है। डॉक्टरों का मानना है कि ऐसे में लोगों को ज्यादा से ज्यादा एहतियात बरतने की जरुरत है। गंभीर मामलों में इसके चलते शरीर के कई अंग काम करना बंद कर सकते हैं, जिसके चलते इंसान की मौत भी हो सकती है।
क्या है इलाज?
कुछ हद तक इसका इलाज मुमकिन है। शुरुआती लक्षणों से पता चलता है कि मैक्सिको और अमेरिका के कुछ मरीजों का इलाज टैमीफ्लू और रेलिंज़ा नामक वायरस मारक दवाओं से सफलतापूर्वक किया गया है। ये दवाएं इस फ़्लू को रोक तो नही सकती पर इसके खतरनाक नतीजों को कम कर जान जरूर बचा सकती हैं। स्वाइन प़्लू से बचने का सबसे अच्छा तरीका साफ सफाई है। छींकते समय हमेशा अपनी नाक और मुंह कपड़े से ढक कर रखें। छींकने के बाद अपने हाथ जरूर धोएं। गंदगी से वायरस बड़ी आसानी से फैलते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि ठंडी चीजों कोल्ड ड्रिंक्स और आइसक्रीम से परहेज रखना चाहिए और ऐसा खाना खाना चाहिए जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़े।
स्वाइन फ्लू जब 2009 में कहर बन कर बरपा था तब भारतीय बाजारों में इसका टीका अपलब्ध नहीं था लेकिन अब इसके टीके का इस्तेमाल सफलतम रूप में किया जा रहा है और इसकी मदद से वर्तमान में एच1एन1 फ्लू से बचाव संभव है। यदि हम थोडी सी सावधानी बरते तो इस बीमारी से बचा जा सकता है। किसी भी व्यक्ति को अगर स्वाइन फ्लू के लक्षण दिखते हैं तो वो घबराये नहीं क्योंकि अब स्वाइन फ्लू वैक्सीन मौजूद है।स्वाइन फ्लू के टीका का नाम नैसोवैक है जिसे नाक के जरिए दिया जाता है। इस टीके की 0.5 मिली लीटर की एक बूंद किसी भी व्यक्ति को इस रोग से करीब दो साल तक दूर रखती है। यह टीका तीन साल से अधिक के बच्चों और बड़े-बूढ़ों के लिए खास तौर पर उपयोगी है। हालांकि इसे गर्भवती महिला, छोटे बच्चे और कम प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग भी ले सकते हैं। नैसोवैक भारतीय वैज्ञानिकों की देन है जिसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है। स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए एक और वैक्सीन बनाई गई है। एचएनवैक ब्रांड नामक इस वैक्सीन को कड़े परीक्षण के बाद सुरक्षित और उपयोगी पाया गया है।एक अन्य टीका वैक्सीफ्लू-एस पर अभी परीक्षण चल रहा है। स्वाइन फ्लू वैक्सीन में एक नाम वैक्सीफ्लू-एस (VaxiFlu-S) का भी है जो देसी है और H1N1 के लिए कारगर है। हालांकि इस टीके का इस्तेमाल 18 वर्ष से ऊपर के लोगों के लिए है लेकिन बच्चों के लिए अभी इसका गहन निरीक्षण जारी है। मार्केट में एक सूई वाला टीका भी उपलब्ध है लेकिन यह अधिक कारगर नहीं है। इसे लेने से बचें। स्वाइन फ्लू जैसी महामारी को जड़ से मिटाने के लिए और भी कई टीके ईजाद किए जा रहे हैं लेकिन अभी उनके आने में देर है।


शनिवार, 2 मार्च 2013

क्या है इसोन धूमकेतू ? What is ISON comet?

क्या है इसोन धूमकेतू ? What is ISON comet?
नया धूमकेतु खोजा गया जो पूर्ण चंद्रमा से भी अधिक उज्जवल हो सकता है
कुछ ऐसा दिखेगा दिन में भी
यह वर्ष खगोलप्रेमियों के लिए विशेष महत्व का हो सकता है। खगोलप्रेमियों एवं पृथ्वी वासियों को इस वर्ष 2013 के अंत में और 2014 के शुरुआती महीनों में आकाश में एक नहीं बल्कि दो-दो चमकते खगोलीय पिंड दिखाई देंगे इनमें एक तो हमारा चन्द्रमा होगा और दूसरा उतना ही बड़ा एक नया खोजा गया पुच्छल तारा (धूमकेतु/कॉमेट) होगा हमारे सौरमंडल के बहुत दूर से एक बहुत बड़ा दड़ियल धूमकेतु सूर्य की तरफ बहुत तेज गति से आ रहा है नवम्बर 2013 में यह सूर्य से निकटतम दूरी पर होगा, तब इसकी चमक चन्द्रमा को भी मात देने लगेगी  
बेलारूस के अर्त्योम नोविचोनोक और रूस के विटाली नेवेस्की
किसने खोजा यह धूमकेतु?
सितम्बर 2012 में दो शौकिया खगोलविदों बेलारूस के अर्त्योम नोविचोनोक और रूस के विटाली नेवेस्की ने इसे अपने प्रेक्षण में पाया था दोनों खगोलविद जब किस्लोवोद्स्क के निकट 21 सितम्बर 2012 को 15.7 इंच (0.4 मीटर) परावर्तक दूरदर्शी से सीसीडी पर इमेज ले रहे थे तब उन्होंने पाया कि उर्ट बादलों की तरफ से कोई ताजा विशाल बर्फ का गोला सौरमंडल में सूर्य की परिक्रमा पथ पर आ रहा है
कितनी दूर यह है पृथ्वी और सूर्य से?
जब यह पहली बार देखा गया तब यह पृथ्वी से 625 लाख मील या एक अरब किलोमीटर दूर था और तब इसकी दूरी सूर्य से 584 मिलियन मील या 93.9 करोड़ किलोमीटर दूर थी। यह तब कर्क तारामंडल के धूमिल कोने में विराजमान था।
कब व कहाँ दिखेगा यह धूमकेतु
इन खगोलविज्ञानियों ने इस पुच्छल तारे (कॉमेट) को C/2012 S1 (ISON) नाम दिया है C/2012 S1 वर्तमान में कर्क तारामंडल के उत्तर पश्चिमी कोने में है। आकाशीय पिंडों की चमक मापने की रिवर्स स्केल पर इसकी चमक 18.8 परिमाण में मापी गयी। सीसीडी उपकरणों से अभी यह खगोलविदों के जद में धूमिल दृश्यमान है और 2013 अगस्त तक यह बायनाकुलर से दृश्यमान होगा जबकि नवम्बर 2013 तक तो यह नंगी आँखों से भी दिखाई देगा, तत्पश्चात मध्य जनवरी 2014 तक यह उत्तरी गोलार्द्ध निवासियों को दृश्यमान रहेगा। इन दोनों शौंकिया खगोलविदों, अर्त्योम नोविचोनोक और विटाली नेवेस्की का मानना है कि देर नवम्बर से मध्य जनवरी तक यह एक भव्य उज्जवल धूमकेतु बनेगा
कहाँ से आते हैं धूमकेतु
इसोन C/2012 S1 (ISON) का नामकरण International Scientific Optical Network (अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक ऑप्टिकल संजाल) का संक्षिप्त रूप है। यह नेटवर्क दुनिया भर में परस्पर सम्बद्ध कम्प्यूटरों का एक विशाल तंत्र होता हैयह रेडियो दूरबीनों से प्राप्त ब्यौरे का संसाधन करता हैविज्ञान पत्रिका न्यू-साइंटिस्ट (New Scientist) में प्रकाशित तथ्यों के अनुसार नेपच्यून ग्रह के पथ के बाहर विशाल धूमकेतुओं का एक बहुत विशाल झुरमुट है जिसे उर्ट क्लाउड कहते हैं। वहाँ से यदा-कदा इन धूमकेतुओं के दीर्घ वृत्ताकार पथ से कोई बर्फ-धूल व चट्टानों का बड़ा सा गोला यानि धूमकेतु सूर्य की प्रभावी क्षेत्रीय गुरुत्व सीमा में आ जाता है और दीर्घवृत्तीय कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करने लगता है
कैसे बनती है इसकी पूँछ और चमक
सूर्य की तेज उष्मा से इसकी धुँधली बर्फीली चट्टानें पिघलने लग जाती हैं। आरम्भ में धूमकेतु एक धुँधली बर्फीली गेंद के जैसा ही होता हैइसके पिघलने से इसके आगे जटाधारी सिर (Head of the comet) जो कि किनारों से धुँधला बनता है, और इस सिर के नीचे होता है, बन जाता है। इसका केन्द्रीय भाग यानि कि  इसका नाभिक सौर विकिरण के दाब से इसे धरती की ओर ठेलता है और पीछे इसकी पूँछ का निर्माण होता है। जैसे-जैसे दीर्घवृत्तीय सौर परिक्रमा पथ पर यह सूर्य के नजदीक आता है इसका आभामंडल (Halo) बनना शुरू हो जाता है। सौर हवाएँ पिघलते हिम धूल को सूर्य के विपरीत बहा ले चलती हैं जिनसे इसकी खास पूँछ का निर्माण होता है
क्या पुच्छल तारा अनहोनी लाता है?
भारत में प्रायः इसे पुच्छल तारे के नाम से जाना जाता है जबकि संस्कृत ग्रंथों में इसे केतु कहा गया है। यहाँ पुच्छल तारों को अशुभ माना जाता हैकिन्तु इन पिंडों का आगमन अन्य खगोलीय घटनाओं की तरह सामान्य घटनाएँ ही है। हालाँकि खतरे की थोड़ी आशंका बनी रहती है कि कहीं कोई धूमकेतु पथभ्रष्ट होकर पृथ्वी के परिक्रमा पथ पर आकर धरती से ही ना टकरा जाए ना जाने कितनी ही बार पृथ्वी विशालकाय धूमकेतुओं की विरलीकृत विशालकाय पूँछ में से गुजर चुकी है पर इसका कोई बड़ा नुकसान रिकार्ड नहीं हुआ है एक आम धारणा है कि धूमकेतु पृथ्वी के नजदीक से गुजरने से पृथ्वी पर कोई अनहोनी या महामारी होती है परन्तु इसका कोई प्रमाण नहीं है। धूमकेतु कोई अनर्थ, अमंगल या अनहोनी नहीं लातेइनके पृथ्वी से टकरा जाने की संभावना भी अति क्षीण ही होती है। यदि ऐसा कभी दर्ज होता है तो मनुष्य अपनी वर्तमान समय की विकसित तकनीक से पृथ्वी से ही रॉकेट-मिसाइल दाग कर इनको परिक्रमा पथ से विचलित कर परे ठेल सकता है वैज्ञानिकों के एक बड़े वर्ग का यह भी मानना है कि पृथ्वी पर जीवन के लिए जरूरी कच्चा माल सुदूर अतीत में धूमकेतुओं से ही आयातित हुआ था फ़्रेड होइल और कुछ खगोलविद ऐसा मानते आये हैं कि अब से कोई साढ़े छ: करोड़ वर्ष पहले एक विशालकाय धूमकेतु के पृथ्वी से आ टकराने से विशालकाय प्राणी डायनासोर का सफाया हुआ था
कब दिखाई देगा पृथ्वी से
यदि अनुमान सच साबित हुए तो यह धूमकेतु आगामी दिसम्बर महीने में दिन में भी चन्द्रमा जैसा दिख सकता है। यह परिमाप में काफी बड़ा लग रहा है ऐसा भी समझा जा रहा है कि इसोन बहुत कुछ 1680 के ग्रेट कॉमेट ऑफ़ न्यूटन धूमकेतु जैसा हो और वैसा ही उसका भ्रमण पथ हो इसी अगस्त माह तक इसोन धरती से लगभग 32 करोड़ कि॰मी॰ तक आ पहुँचेगा और इसका आभामंडल बनना शुरु हो जायेगा और तभी सही अंदाजा भी हो सकेगा कि यह कैसा दिखेगा इसलिए तब तक खगोलप्रेमियों व आम जनों को प्रतीक्षा करनी होगी 
धूमकेतुओं की समयावधि    
वास्तव में धूमकेतु सूर्य के समयावधिक मेहमान होते हैं जो धूमकेतु 200 साल से पहले सूर्य से मिलने चले आते हैं इन्हें लघुआवधिक धूमकेतु (शार्ट पीरियड कॉमेट) कहा जाता हैजो धूमकेतु 200 साल के बाद सूर्य के निकट आ पाते हैं, उन्हें दीर्घआवधिक धूमकेतु (लॉंग पीरियड कॉमेट) कहा जाता है। हमारा चिरपरिचित हेली का धूमकेतु (Halley Comet) लघुआवधिक धूमकेतु है जो हर 75-76 वर्ष के बाद सूर्य के नजदीक आता है

धूमकेतुओं की चमक की भविष्यवाणी सदा पूर्णतया सत्य नहीं होती हालाँकि उनका प्रदर्शन घोषित भविष्यवाणी से कम या अधिक हो सकता है। यदि इस धूमकेतु का प्रदर्शन अनुमानों और गणनाओं के मुताबिक होता है तो संभवतः यह इस सभ्यता की एकमात्र ज्ञात खगोलीय घटना होगी। यदि भूतकाल में झाँकें तो पहले भी कई धूमकेतुओं का बहुत बढ़-चढ़ कर महिमामंडन किया गया था परन्तु उनका प्रदर्शन फीका ही रहा था। अब खगोलविदों के पास अपेक्षाकृत उन्नत उपकरण हैं इसलिए आशा है कि और नजदीक आने पर पूर्व भविष्यवाणी में सुधार होता रहेगा। अभी तो हमें केवल इतना ही जान कर उत्साहित हो जाना चाहिए कि बस कुछ समय बाद ही हम इस अभूतपूर्व खगोलीय घटना के दर्शक बनने जा रहे हैं। 
16 फरवरी 2013 तक अपडेट 

नासा   ने उस दूरस्थ धूमकेतु की पहली तस्वीर ले ली है जो कुछ महीने बाद हम पृथ्वीवासियों को शानदार प्रकाश का नजारा दे सकता हैधूमकेतू जिसका नाम C/2012 S1 (ISON) है, की ताज़ा तस्वीर नासा के डीप इम्पेक्ट स्पेसक्राफ्ट ने 17 और 18 जनवरी को अपने मध्यम रिसोल्यूशन के इमेजर से 36 घंटे के पीरियड में तब ली जब डीप इम्पेक्ट स्पेसक्राफ्ट इस धूमकेतू से 493 लाख मील(793 लाख किलोमीटर) दूर था
बहुत से वैज्ञानिकों ने इसोन के उज्जवल भविष्य की कामना की हैपासाडेना स्तिथ नासा की जेट प्रोपल्सन प्रयोगशाला में डीप इम्पेक्ट स्पेसक्राफ्ट परियोजना के प्रबंधक टिम लार्सन का कहना है कि यह चौथा धूमकेतू है जिसके इससे वैज्ञानिक प्रेक्षण लिए जा रहे हैं और पृथ्वी के पास से गुजरने पर इस संभावित
धूमकेतु के पृथ्वी से दूरस्थ बिंदु से सम्बन्धित आंकड़े एकत्र किये जा रहे हैं 
जैसे ही धूमकेतू सूर्य के नजदीक पहुंचेगा तो सूर्य की गर्मी से धूल व गैसीय वाष्पों से इसकी चमकीली पूंछ बनेगीजबकि अभी इसोन अभी बहुत दूर है फिर भी नासा का कहना है कि अभी भी इसके केन्द्र से चालीस हजार मील विस्तारित/लंबी धूल और गैसों की पूंछ सक्रिय है
इसोन सम्भवतः 26 दिसम्बर 2013 को पृथ्वी से 40 लाख मील की दूरी पर होगा 
इसोन को दीर्घ आवधिक धूमकेतू कहा जाएगा जिनकी परिक्रमण कक्षाएं सैकड़ों, हजारों और लाखों वर्षों की होती हैंनासा का विश्वास है कि सम्भवतः यह इसोन का  पहला  परिक्रमण पथ हैसौर मंडल में धूमकेतू उर्ट बादलों से आते हैं सौर मंडल के बाह्य  सिरे पर बर्फ के विशाल गोलाकार पिंड स्थित हैं जो कि कभी कभी किसी कारण से गुरुत्वाकर्षण विचलन के कारण भटक कर सौरमंडल में सूर्य के चारों और अपना लंबा परिक्रमण पथ बना लेते हैंनासा ने यह भी चेतावनी दी है कि यह धूमकेतू अंजाम से पहले टूट भी सकता है

बुधवार, 2 जनवरी 2013

क्या होता है फल अंजीर Anjir Fruit-Figs

क्या होता है फल अंजीर Anjir Fruit-Figs
परिचय : अफगानिस्तान के काबुल में अंजीर की अधिक पैदावार होती है। हमारे देश में बंगलूर, सूरत, कश्मीर, उत्तर-प्रदेश, नासिक तथा मैसूर में यह ज्यादा पैदा होता है। अंजीर का पेड़ लगभग 4.5 से 5.5 मीटर ऊंचा होता है। 
इसके पत्ते और शाखाओं पर रोएं होते हैं तथा कच्चे फल हरे और पकने पर लाल-आसमानी रंग के हो जाते हैं। सूखे अंजीर हमेशा उपलब्ध होते हैं। कच्चे फल की सब्जी बनती है। इस के बीजों से तेल निकाला जाता है।
कई बार जानकारी न होने के कारण हम अपने आस- पास मौजूद स्वास्थ्यवर्धक और बहुपयोगी चीजों को अनदेखा कर देते है, जिनमे अंजीर भी शामिल है। अंजीर एक स्वास्थ्यवर्धक फल है,जिसका उपयोग हम पकवानों में बेहतरीन स्वाद के लिए करते है। नाशपाती के आकार के इस छोटे से फल की अपनी कोई खुशबू तो नहीं होती पर यह रसीला और गूदेदार होता है। इसके छिलके के रंग का स्वाद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता पर इसका स्वाद इस बात पर निर्भर करता है कि इसे कहां उगाया गया है और यह कितना पका है।
विभिन्न भाषाओं में नाम

संस्कृत- काकोदुम्बरिका।
हिंदी- अंजीर।
मराठी- अंजीर।
गुजराती- पेपरी।
बंगाली- पेयारा।
अंग्रेजी- फिग।
लैटिन- फिकस कैरिका।
रंग  अंजीर रंग सुर्ख और स्याह मिश्रित होता है।
स्वाद  यह खाने में मीठा होता है।
स्वरूप अंजीर एक बिलायती (विदेशी) पेड़ का फल है जो गूलर के समान होता है। यह जंगलों में अक्सर पाया जाता है। आमतौर पर लोग इसे बनगूलर के नाम से भी पुकारते हैं।
स्वभाव यह गर्म प्रकृति का होता है।
हानिकारक अंजीर का अधिक सेवन यकृत (जिगर) और आमाशय के लिए हानिकारक हो सकता है।
दोषों को दूर करने वाला  अंजीर के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए बादाम का उपयोग किया जाता है।
मात्रा (खुराक)  अंजीर की पांच दाने तक ले सकते हैं।

गुण  अंजीर के सेवन से मन प्रसन्न रहता है। यह स्वभाव को कोमल बनाता है। यकृत और प्लीहा (तिल्ली) के लिए लाभकारी होता है, कमजोरी को दूर करता है तथा खांसी को नाश करता है।
वैज्ञानिक मतानुसार अंजीर के रासायनिक गुणों का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि
इसके सूखे फल में कार्बोहाइड्रेट (शर्करा) 63 प्रतिशत, प्रोटीन 5.5 प्रतिशत, सेल्यूलोज 7.3 प्रतिशत, चिकनाई एक प्रतिशत, खनिज लवण 3 प्रतिशत, अम्ल 1.2 प्रतिशत, राख 2.3 प्रतिशत और जल 20.8 प्रतिशत होता है। इसके अलावा प्रति 100 ग्राम अंजीर में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग लोहा, विटामिन `ए´ 270 आई.यू., थोड़ी मात्रा में चूना, पोटैशियम, सोडियम, गंधक, फास्फोरिक एसिड और गोंद भी पाया जाता है।

तो है ना कमाल का फल अंजीर .....

रविवार, 9 दिसंबर 2012

क्यों जरूरी है कैल्शियम? Why calcium is important?


क्यों जरूरी है कैल्शियम ? Why calcium is important ?
कैल्शियम यह जीवित प्राणियों के लिए अत्यावश्यक होता है। भोजन में इसकी समुचित मात्र होनी चाहिए। खाने योग्य चूर्णातु दूध सहित कई खाद्य पदार्थो में मिलती है। खान-पान के साथ-साथ चूर्णातु के कई औद्योगिक इस्तेमाल भी हैं जहां इसका शुद्ध रूप और इसके कई यौगिकों का इस्तेमाल किया जाता है।
कैल्शियम शरीर द्वारा मजबूत हड्डियों के निर्माण के लिए एक आवश्यक खनिज है और उन्हें अपने जीवन भर में मजबूत रखने के लिए आवश्यक है। कैल्शियम भी ऐसे मांसपेशियों में संकुचन के रूप में अन्य उद्देश्यों के लिए आवश्यक है।प्रत्येक युवा की यह तमन्ना होती है कि उसकी भुजाएं बलिष्ठ हों और चेहरे से ज्यादा आकर्षण पूरे शरीर में दिखे। इसके लिए वे तरह-तरह के व्यायाम करते हैं और अत्याधुनिक मशीनी सुविधाओं से सुसज्जित जिम में भी जाते हैं । मगर क्या आप जानते हैं कि मजबूत भुजाएं और बलिष्ठ शरीर के लिए किस तत्व की जरूरत है?
कैल्शियम एक ऐसा तत्व है, जिसे हर युवा को अपनाना चाहिए। लगभग सभी कैल्शियम (99 प्रतिशत) हड्डियों में संग्रहीत किया जाता है। शेष एक प्रतिशत के शरीर में होता है। कैल्शियम का हमारे शरीर में खास महत्व होता है। आइए देखते हैं हमारे भोजन में यह किस तरह से मिलता है और शरीर को मजबूती प्रदान करता है । इसके महत्व को आमतौर पर सभी माताएं जानती हैं। बच्चों को दिन में दो-तीन बार जबरन दूध पिलाने वाली आज की माताएं जानती हैं कि कैल्शियम उसकी बढ़ती हड्डियों के लिए कितना जरूरी है।
वहीं पुराने समय की या कम पढ़ी-लिखी ग्रामीण माताएं भी इतना तो अवश्य जानती थीं कि दूध पीने से बच्चे का डील-डौल व कद बढ़ता है। यह बच्चे को चुस्त व बलिष्ठ भी बनाता है। भले ही उन्हें दूध में पाये जाने वाले अनमोल कैल्शियम का ज्ञान न हो, जो बच्चों की हड्डियों, दांतों के स्वरूप, उनके आकार व उन्हें स्वस्थ व मजबूत बनाने में अति सहायक सिद्ध हुआ है। इसी कैल्शियम की निरंतर कमी के कारण बच्चों के दांत, हड्डियां व शरीर कमजोर हो जाते हैं।
आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में भी कैल्शियम का बडा महत्व है। कैल्शियम को कमजोर व पतली हड्डियों को मजबूत करने, दिल की कमजोरी, गुर्दे की पथरियों को नष्ट करने और महिलाओं के मासिक धर्म से संबंधित रोगों के उपचार में लाभकारी पाया गया है। 
खाद्य पदार्थ ही कैल्शियम का अच्छा स्रोत हैं डेयरी उत्पाद, दूध, दही और पनीर और हरी पत्तेदार सब्जियां, जैसे कि गोभी और शलजम साग जैसे शामिल हैं।
दैनिक भोजन में हमें कुछ पदार्थों से कैल्शियम तत्व मिल सकता है जैसे पनीर, सूखी मछली, राजमा, दही, गरी गोला, सोयाबीन आदि। 
 इसी प्रकार दूध एक गिलास (गाय) से 260 मिलीग्राम, दूध एक गिलास (भैंस) से 410 मिलीग्राम कैल्शियम मिलता है।
प्रेशर कुकर में पकाये गये चावल, मोटे आटे की रोटी, टमाटर से हमें काफी कैल्शियम मिल सकता है.
कैल्शियम उचित मात्र में खाने से हमारी बुद्धि प्रखर होती है और तर्क शक्ति भी बढ़ती है. हरी पत्तेदार सब्जियों में भी यह तत्व पाया जाता है।
कैल्शियम की कमी के कारण
पाचन कमजोर होने से भोजन में से कैल्शियम का अवशोषण कम होना।
दैनिक आहार में कैल्शियमयुक्त पदार्थों की कमी।
महिलाओं को अधिक मासिक धर्म होना।
नवजात शिशुओं में स्तनपान का अभाव।
धूप, शारीरिक श्रम व यौगिक क्रियाओं का अभाव।
शकरयुक्त पदार्थों का अधिक सेवन।
हमें प्रतिदिन कैल्शियम तत्व निम्न रूप से लेना चाहिए-
* गर्भवती व दूध पिलाने वाली महिलाओं के लिए 1200 मिलीग्राम। 
* 6 मास से छोटे बच्चों के लिए 400 मिलीग्राम। 
* 6 मास से 1 वर्ष के बच्चों के लिए 600 मिलीग्राम।
* 1 वर्ष से 10 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए 800 मिलीग्राम।
* 11 वर्ष से ऊपर सभी आयु वर्ग के लिए 1200 मिलीग्राम। 
कैल्शियम  की कमी के कुछ लक्षण
कन्धों का झुकना।
कमर में वक्रीय झुकाव।
कद में कमी दर्ज होना।
कमर में दर्द।
पेट बाहर आना।
पोस्चर मुद्रा का बदलना।
हड्डियों का पोला, कमजोर होकर टूटना।
झुकी हुई कमर।
गलते हुए दाँत।
बच्चों के दाँत देरी से आना।
शरीर में कमजोरी का बना रहना आदि
आहार के संबंध में विशेष रूप से सतर्क रहें। फास्ट फूड, कोल्ड ड्रिंक्स, तला-भुना, मिर्च-मसाला, मैदे तथा शकर से बने पदार्थों से बचें। प्राकृतिक आहार जैसे अंकुरित अनाज, मौसम के ताजे फल व सब्जियाँ, सलाद, मोटे आटे की रोटी, डेयरी प्रोडक्ट को अपने आहार में विशेष स्थान दें।
तो  आओ और कैल्शियम को अपने भोजन में शामिल करें।
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