शनिवार, 2 मार्च 2013

क्या है इसोन धूमकेतू ? What is ISON comet?

क्या है इसोन धूमकेतू ? What is ISON comet?
नया धूमकेतु खोजा गया जो पूर्ण चंद्रमा से भी अधिक उज्जवल हो सकता है
कुछ ऐसा दिखेगा दिन में भी
यह वर्ष खगोलप्रेमियों के लिए विशेष महत्व का हो सकता है। खगोलप्रेमियों एवं पृथ्वी वासियों को इस वर्ष 2013 के अंत में और 2014 के शुरुआती महीनों में आकाश में एक नहीं बल्कि दो-दो चमकते खगोलीय पिंड दिखाई देंगे इनमें एक तो हमारा चन्द्रमा होगा और दूसरा उतना ही बड़ा एक नया खोजा गया पुच्छल तारा (धूमकेतु/कॉमेट) होगा हमारे सौरमंडल के बहुत दूर से एक बहुत बड़ा दड़ियल धूमकेतु सूर्य की तरफ बहुत तेज गति से आ रहा है नवम्बर 2013 में यह सूर्य से निकटतम दूरी पर होगा, तब इसकी चमक चन्द्रमा को भी मात देने लगेगी  
बेलारूस के अर्त्योम नोविचोनोक और रूस के विटाली नेवेस्की
किसने खोजा यह धूमकेतु?
सितम्बर 2012 में दो शौकिया खगोलविदों बेलारूस के अर्त्योम नोविचोनोक और रूस के विटाली नेवेस्की ने इसे अपने प्रेक्षण में पाया था दोनों खगोलविद जब किस्लोवोद्स्क के निकट 21 सितम्बर 2012 को 15.7 इंच (0.4 मीटर) परावर्तक दूरदर्शी से सीसीडी पर इमेज ले रहे थे तब उन्होंने पाया कि उर्ट बादलों की तरफ से कोई ताजा विशाल बर्फ का गोला सौरमंडल में सूर्य की परिक्रमा पथ पर आ रहा है
कितनी दूर यह है पृथ्वी और सूर्य से?
जब यह पहली बार देखा गया तब यह पृथ्वी से 625 लाख मील या एक अरब किलोमीटर दूर था और तब इसकी दूरी सूर्य से 584 मिलियन मील या 93.9 करोड़ किलोमीटर दूर थी। यह तब कर्क तारामंडल के धूमिल कोने में विराजमान था।
कब व कहाँ दिखेगा यह धूमकेतु
इन खगोलविज्ञानियों ने इस पुच्छल तारे (कॉमेट) को C/2012 S1 (ISON) नाम दिया है C/2012 S1 वर्तमान में कर्क तारामंडल के उत्तर पश्चिमी कोने में है। आकाशीय पिंडों की चमक मापने की रिवर्स स्केल पर इसकी चमक 18.8 परिमाण में मापी गयी। सीसीडी उपकरणों से अभी यह खगोलविदों के जद में धूमिल दृश्यमान है और 2013 अगस्त तक यह बायनाकुलर से दृश्यमान होगा जबकि नवम्बर 2013 तक तो यह नंगी आँखों से भी दिखाई देगा, तत्पश्चात मध्य जनवरी 2014 तक यह उत्तरी गोलार्द्ध निवासियों को दृश्यमान रहेगा। इन दोनों शौंकिया खगोलविदों, अर्त्योम नोविचोनोक और विटाली नेवेस्की का मानना है कि देर नवम्बर से मध्य जनवरी तक यह एक भव्य उज्जवल धूमकेतु बनेगा
कहाँ से आते हैं धूमकेतु
इसोन C/2012 S1 (ISON) का नामकरण International Scientific Optical Network (अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक ऑप्टिकल संजाल) का संक्षिप्त रूप है। यह नेटवर्क दुनिया भर में परस्पर सम्बद्ध कम्प्यूटरों का एक विशाल तंत्र होता हैयह रेडियो दूरबीनों से प्राप्त ब्यौरे का संसाधन करता हैविज्ञान पत्रिका न्यू-साइंटिस्ट (New Scientist) में प्रकाशित तथ्यों के अनुसार नेपच्यून ग्रह के पथ के बाहर विशाल धूमकेतुओं का एक बहुत विशाल झुरमुट है जिसे उर्ट क्लाउड कहते हैं। वहाँ से यदा-कदा इन धूमकेतुओं के दीर्घ वृत्ताकार पथ से कोई बर्फ-धूल व चट्टानों का बड़ा सा गोला यानि धूमकेतु सूर्य की प्रभावी क्षेत्रीय गुरुत्व सीमा में आ जाता है और दीर्घवृत्तीय कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करने लगता है
कैसे बनती है इसकी पूँछ और चमक
सूर्य की तेज उष्मा से इसकी धुँधली बर्फीली चट्टानें पिघलने लग जाती हैं। आरम्भ में धूमकेतु एक धुँधली बर्फीली गेंद के जैसा ही होता हैइसके पिघलने से इसके आगे जटाधारी सिर (Head of the comet) जो कि किनारों से धुँधला बनता है, और इस सिर के नीचे होता है, बन जाता है। इसका केन्द्रीय भाग यानि कि  इसका नाभिक सौर विकिरण के दाब से इसे धरती की ओर ठेलता है और पीछे इसकी पूँछ का निर्माण होता है। जैसे-जैसे दीर्घवृत्तीय सौर परिक्रमा पथ पर यह सूर्य के नजदीक आता है इसका आभामंडल (Halo) बनना शुरू हो जाता है। सौर हवाएँ पिघलते हिम धूल को सूर्य के विपरीत बहा ले चलती हैं जिनसे इसकी खास पूँछ का निर्माण होता है
क्या पुच्छल तारा अनहोनी लाता है?
भारत में प्रायः इसे पुच्छल तारे के नाम से जाना जाता है जबकि संस्कृत ग्रंथों में इसे केतु कहा गया है। यहाँ पुच्छल तारों को अशुभ माना जाता हैकिन्तु इन पिंडों का आगमन अन्य खगोलीय घटनाओं की तरह सामान्य घटनाएँ ही है। हालाँकि खतरे की थोड़ी आशंका बनी रहती है कि कहीं कोई धूमकेतु पथभ्रष्ट होकर पृथ्वी के परिक्रमा पथ पर आकर धरती से ही ना टकरा जाए ना जाने कितनी ही बार पृथ्वी विशालकाय धूमकेतुओं की विरलीकृत विशालकाय पूँछ में से गुजर चुकी है पर इसका कोई बड़ा नुकसान रिकार्ड नहीं हुआ है एक आम धारणा है कि धूमकेतु पृथ्वी के नजदीक से गुजरने से पृथ्वी पर कोई अनहोनी या महामारी होती है परन्तु इसका कोई प्रमाण नहीं है। धूमकेतु कोई अनर्थ, अमंगल या अनहोनी नहीं लातेइनके पृथ्वी से टकरा जाने की संभावना भी अति क्षीण ही होती है। यदि ऐसा कभी दर्ज होता है तो मनुष्य अपनी वर्तमान समय की विकसित तकनीक से पृथ्वी से ही रॉकेट-मिसाइल दाग कर इनको परिक्रमा पथ से विचलित कर परे ठेल सकता है वैज्ञानिकों के एक बड़े वर्ग का यह भी मानना है कि पृथ्वी पर जीवन के लिए जरूरी कच्चा माल सुदूर अतीत में धूमकेतुओं से ही आयातित हुआ था फ़्रेड होइल और कुछ खगोलविद ऐसा मानते आये हैं कि अब से कोई साढ़े छ: करोड़ वर्ष पहले एक विशालकाय धूमकेतु के पृथ्वी से आ टकराने से विशालकाय प्राणी डायनासोर का सफाया हुआ था
कब दिखाई देगा पृथ्वी से
यदि अनुमान सच साबित हुए तो यह धूमकेतु आगामी दिसम्बर महीने में दिन में भी चन्द्रमा जैसा दिख सकता है। यह परिमाप में काफी बड़ा लग रहा है ऐसा भी समझा जा रहा है कि इसोन बहुत कुछ 1680 के ग्रेट कॉमेट ऑफ़ न्यूटन धूमकेतु जैसा हो और वैसा ही उसका भ्रमण पथ हो इसी अगस्त माह तक इसोन धरती से लगभग 32 करोड़ कि॰मी॰ तक आ पहुँचेगा और इसका आभामंडल बनना शुरु हो जायेगा और तभी सही अंदाजा भी हो सकेगा कि यह कैसा दिखेगा इसलिए तब तक खगोलप्रेमियों व आम जनों को प्रतीक्षा करनी होगी 
धूमकेतुओं की समयावधि    
वास्तव में धूमकेतु सूर्य के समयावधिक मेहमान होते हैं जो धूमकेतु 200 साल से पहले सूर्य से मिलने चले आते हैं इन्हें लघुआवधिक धूमकेतु (शार्ट पीरियड कॉमेट) कहा जाता हैजो धूमकेतु 200 साल के बाद सूर्य के निकट आ पाते हैं, उन्हें दीर्घआवधिक धूमकेतु (लॉंग पीरियड कॉमेट) कहा जाता है। हमारा चिरपरिचित हेली का धूमकेतु (Halley Comet) लघुआवधिक धूमकेतु है जो हर 75-76 वर्ष के बाद सूर्य के नजदीक आता है

धूमकेतुओं की चमक की भविष्यवाणी सदा पूर्णतया सत्य नहीं होती हालाँकि उनका प्रदर्शन घोषित भविष्यवाणी से कम या अधिक हो सकता है। यदि इस धूमकेतु का प्रदर्शन अनुमानों और गणनाओं के मुताबिक होता है तो संभवतः यह इस सभ्यता की एकमात्र ज्ञात खगोलीय घटना होगी। यदि भूतकाल में झाँकें तो पहले भी कई धूमकेतुओं का बहुत बढ़-चढ़ कर महिमामंडन किया गया था परन्तु उनका प्रदर्शन फीका ही रहा था। अब खगोलविदों के पास अपेक्षाकृत उन्नत उपकरण हैं इसलिए आशा है कि और नजदीक आने पर पूर्व भविष्यवाणी में सुधार होता रहेगा। अभी तो हमें केवल इतना ही जान कर उत्साहित हो जाना चाहिए कि बस कुछ समय बाद ही हम इस अभूतपूर्व खगोलीय घटना के दर्शक बनने जा रहे हैं। 
16 फरवरी 2013 तक अपडेट 

नासा   ने उस दूरस्थ धूमकेतु की पहली तस्वीर ले ली है जो कुछ महीने बाद हम पृथ्वीवासियों को शानदार प्रकाश का नजारा दे सकता हैधूमकेतू जिसका नाम C/2012 S1 (ISON) है, की ताज़ा तस्वीर नासा के डीप इम्पेक्ट स्पेसक्राफ्ट ने 17 और 18 जनवरी को अपने मध्यम रिसोल्यूशन के इमेजर से 36 घंटे के पीरियड में तब ली जब डीप इम्पेक्ट स्पेसक्राफ्ट इस धूमकेतू से 493 लाख मील(793 लाख किलोमीटर) दूर था
बहुत से वैज्ञानिकों ने इसोन के उज्जवल भविष्य की कामना की हैपासाडेना स्तिथ नासा की जेट प्रोपल्सन प्रयोगशाला में डीप इम्पेक्ट स्पेसक्राफ्ट परियोजना के प्रबंधक टिम लार्सन का कहना है कि यह चौथा धूमकेतू है जिसके इससे वैज्ञानिक प्रेक्षण लिए जा रहे हैं और पृथ्वी के पास से गुजरने पर इस संभावित
धूमकेतु के पृथ्वी से दूरस्थ बिंदु से सम्बन्धित आंकड़े एकत्र किये जा रहे हैं 
जैसे ही धूमकेतू सूर्य के नजदीक पहुंचेगा तो सूर्य की गर्मी से धूल व गैसीय वाष्पों से इसकी चमकीली पूंछ बनेगीजबकि अभी इसोन अभी बहुत दूर है फिर भी नासा का कहना है कि अभी भी इसके केन्द्र से चालीस हजार मील विस्तारित/लंबी धूल और गैसों की पूंछ सक्रिय है
इसोन सम्भवतः 26 दिसम्बर 2013 को पृथ्वी से 40 लाख मील की दूरी पर होगा 
इसोन को दीर्घ आवधिक धूमकेतू कहा जाएगा जिनकी परिक्रमण कक्षाएं सैकड़ों, हजारों और लाखों वर्षों की होती हैंनासा का विश्वास है कि सम्भवतः यह इसोन का  पहला  परिक्रमण पथ हैसौर मंडल में धूमकेतू उर्ट बादलों से आते हैं सौर मंडल के बाह्य  सिरे पर बर्फ के विशाल गोलाकार पिंड स्थित हैं जो कि कभी कभी किसी कारण से गुरुत्वाकर्षण विचलन के कारण भटक कर सौरमंडल में सूर्य के चारों और अपना लंबा परिक्रमण पथ बना लेते हैंनासा ने यह भी चेतावनी दी है कि यह धूमकेतू अंजाम से पहले टूट भी सकता है

बुधवार, 2 जनवरी 2013

क्या होता है फल अंजीर Anjir Fruit-Figs

क्या होता है फल अंजीर Anjir Fruit-Figs
परिचय : अफगानिस्तान के काबुल में अंजीर की अधिक पैदावार होती है। हमारे देश में बंगलूर, सूरत, कश्मीर, उत्तर-प्रदेश, नासिक तथा मैसूर में यह ज्यादा पैदा होता है। अंजीर का पेड़ लगभग 4.5 से 5.5 मीटर ऊंचा होता है। 
इसके पत्ते और शाखाओं पर रोएं होते हैं तथा कच्चे फल हरे और पकने पर लाल-आसमानी रंग के हो जाते हैं। सूखे अंजीर हमेशा उपलब्ध होते हैं। कच्चे फल की सब्जी बनती है। इस के बीजों से तेल निकाला जाता है।
कई बार जानकारी न होने के कारण हम अपने आस- पास मौजूद स्वास्थ्यवर्धक और बहुपयोगी चीजों को अनदेखा कर देते है, जिनमे अंजीर भी शामिल है। अंजीर एक स्वास्थ्यवर्धक फल है,जिसका उपयोग हम पकवानों में बेहतरीन स्वाद के लिए करते है। नाशपाती के आकार के इस छोटे से फल की अपनी कोई खुशबू तो नहीं होती पर यह रसीला और गूदेदार होता है। इसके छिलके के रंग का स्वाद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता पर इसका स्वाद इस बात पर निर्भर करता है कि इसे कहां उगाया गया है और यह कितना पका है।
विभिन्न भाषाओं में नाम

संस्कृत- काकोदुम्बरिका।
हिंदी- अंजीर।
मराठी- अंजीर।
गुजराती- पेपरी।
बंगाली- पेयारा।
अंग्रेजी- फिग।
लैटिन- फिकस कैरिका।
रंग  अंजीर रंग सुर्ख और स्याह मिश्रित होता है।
स्वाद  यह खाने में मीठा होता है।
स्वरूप अंजीर एक बिलायती (विदेशी) पेड़ का फल है जो गूलर के समान होता है। यह जंगलों में अक्सर पाया जाता है। आमतौर पर लोग इसे बनगूलर के नाम से भी पुकारते हैं।
स्वभाव यह गर्म प्रकृति का होता है।
हानिकारक अंजीर का अधिक सेवन यकृत (जिगर) और आमाशय के लिए हानिकारक हो सकता है।
दोषों को दूर करने वाला  अंजीर के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए बादाम का उपयोग किया जाता है।
मात्रा (खुराक)  अंजीर की पांच दाने तक ले सकते हैं।

गुण  अंजीर के सेवन से मन प्रसन्न रहता है। यह स्वभाव को कोमल बनाता है। यकृत और प्लीहा (तिल्ली) के लिए लाभकारी होता है, कमजोरी को दूर करता है तथा खांसी को नाश करता है।
वैज्ञानिक मतानुसार अंजीर के रासायनिक गुणों का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि
इसके सूखे फल में कार्बोहाइड्रेट (शर्करा) 63 प्रतिशत, प्रोटीन 5.5 प्रतिशत, सेल्यूलोज 7.3 प्रतिशत, चिकनाई एक प्रतिशत, खनिज लवण 3 प्रतिशत, अम्ल 1.2 प्रतिशत, राख 2.3 प्रतिशत और जल 20.8 प्रतिशत होता है। इसके अलावा प्रति 100 ग्राम अंजीर में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग लोहा, विटामिन `ए´ 270 आई.यू., थोड़ी मात्रा में चूना, पोटैशियम, सोडियम, गंधक, फास्फोरिक एसिड और गोंद भी पाया जाता है।

तो है ना कमाल का फल अंजीर .....

रविवार, 9 दिसंबर 2012

क्यों जरूरी है कैल्शियम? Why calcium is important?


क्यों जरूरी है कैल्शियम ? Why calcium is important ?
कैल्शियम यह जीवित प्राणियों के लिए अत्यावश्यक होता है। भोजन में इसकी समुचित मात्र होनी चाहिए। खाने योग्य चूर्णातु दूध सहित कई खाद्य पदार्थो में मिलती है। खान-पान के साथ-साथ चूर्णातु के कई औद्योगिक इस्तेमाल भी हैं जहां इसका शुद्ध रूप और इसके कई यौगिकों का इस्तेमाल किया जाता है।
कैल्शियम शरीर द्वारा मजबूत हड्डियों के निर्माण के लिए एक आवश्यक खनिज है और उन्हें अपने जीवन भर में मजबूत रखने के लिए आवश्यक है। कैल्शियम भी ऐसे मांसपेशियों में संकुचन के रूप में अन्य उद्देश्यों के लिए आवश्यक है।प्रत्येक युवा की यह तमन्ना होती है कि उसकी भुजाएं बलिष्ठ हों और चेहरे से ज्यादा आकर्षण पूरे शरीर में दिखे। इसके लिए वे तरह-तरह के व्यायाम करते हैं और अत्याधुनिक मशीनी सुविधाओं से सुसज्जित जिम में भी जाते हैं । मगर क्या आप जानते हैं कि मजबूत भुजाएं और बलिष्ठ शरीर के लिए किस तत्व की जरूरत है?
कैल्शियम एक ऐसा तत्व है, जिसे हर युवा को अपनाना चाहिए। लगभग सभी कैल्शियम (99 प्रतिशत) हड्डियों में संग्रहीत किया जाता है। शेष एक प्रतिशत के शरीर में होता है। कैल्शियम का हमारे शरीर में खास महत्व होता है। आइए देखते हैं हमारे भोजन में यह किस तरह से मिलता है और शरीर को मजबूती प्रदान करता है । इसके महत्व को आमतौर पर सभी माताएं जानती हैं। बच्चों को दिन में दो-तीन बार जबरन दूध पिलाने वाली आज की माताएं जानती हैं कि कैल्शियम उसकी बढ़ती हड्डियों के लिए कितना जरूरी है।
वहीं पुराने समय की या कम पढ़ी-लिखी ग्रामीण माताएं भी इतना तो अवश्य जानती थीं कि दूध पीने से बच्चे का डील-डौल व कद बढ़ता है। यह बच्चे को चुस्त व बलिष्ठ भी बनाता है। भले ही उन्हें दूध में पाये जाने वाले अनमोल कैल्शियम का ज्ञान न हो, जो बच्चों की हड्डियों, दांतों के स्वरूप, उनके आकार व उन्हें स्वस्थ व मजबूत बनाने में अति सहायक सिद्ध हुआ है। इसी कैल्शियम की निरंतर कमी के कारण बच्चों के दांत, हड्डियां व शरीर कमजोर हो जाते हैं।
आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में भी कैल्शियम का बडा महत्व है। कैल्शियम को कमजोर व पतली हड्डियों को मजबूत करने, दिल की कमजोरी, गुर्दे की पथरियों को नष्ट करने और महिलाओं के मासिक धर्म से संबंधित रोगों के उपचार में लाभकारी पाया गया है। 
खाद्य पदार्थ ही कैल्शियम का अच्छा स्रोत हैं डेयरी उत्पाद, दूध, दही और पनीर और हरी पत्तेदार सब्जियां, जैसे कि गोभी और शलजम साग जैसे शामिल हैं।
दैनिक भोजन में हमें कुछ पदार्थों से कैल्शियम तत्व मिल सकता है जैसे पनीर, सूखी मछली, राजमा, दही, गरी गोला, सोयाबीन आदि। 
 इसी प्रकार दूध एक गिलास (गाय) से 260 मिलीग्राम, दूध एक गिलास (भैंस) से 410 मिलीग्राम कैल्शियम मिलता है।
प्रेशर कुकर में पकाये गये चावल, मोटे आटे की रोटी, टमाटर से हमें काफी कैल्शियम मिल सकता है.
कैल्शियम उचित मात्र में खाने से हमारी बुद्धि प्रखर होती है और तर्क शक्ति भी बढ़ती है. हरी पत्तेदार सब्जियों में भी यह तत्व पाया जाता है।
कैल्शियम की कमी के कारण
पाचन कमजोर होने से भोजन में से कैल्शियम का अवशोषण कम होना।
दैनिक आहार में कैल्शियमयुक्त पदार्थों की कमी।
महिलाओं को अधिक मासिक धर्म होना।
नवजात शिशुओं में स्तनपान का अभाव।
धूप, शारीरिक श्रम व यौगिक क्रियाओं का अभाव।
शकरयुक्त पदार्थों का अधिक सेवन।
हमें प्रतिदिन कैल्शियम तत्व निम्न रूप से लेना चाहिए-
* गर्भवती व दूध पिलाने वाली महिलाओं के लिए 1200 मिलीग्राम। 
* 6 मास से छोटे बच्चों के लिए 400 मिलीग्राम। 
* 6 मास से 1 वर्ष के बच्चों के लिए 600 मिलीग्राम।
* 1 वर्ष से 10 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए 800 मिलीग्राम।
* 11 वर्ष से ऊपर सभी आयु वर्ग के लिए 1200 मिलीग्राम। 
कैल्शियम  की कमी के कुछ लक्षण
कन्धों का झुकना।
कमर में वक्रीय झुकाव।
कद में कमी दर्ज होना।
कमर में दर्द।
पेट बाहर आना।
पोस्चर मुद्रा का बदलना।
हड्डियों का पोला, कमजोर होकर टूटना।
झुकी हुई कमर।
गलते हुए दाँत।
बच्चों के दाँत देरी से आना।
शरीर में कमजोरी का बना रहना आदि
आहार के संबंध में विशेष रूप से सतर्क रहें। फास्ट फूड, कोल्ड ड्रिंक्स, तला-भुना, मिर्च-मसाला, मैदे तथा शकर से बने पदार्थों से बचें। प्राकृतिक आहार जैसे अंकुरित अनाज, मौसम के ताजे फल व सब्जियाँ, सलाद, मोटे आटे की रोटी, डेयरी प्रोडक्ट को अपने आहार में विशेष स्थान दें।
तो  आओ और कैल्शियम को अपने भोजन में शामिल करें।
अंतर्जाल  जानकारियों पर आधारित लेख

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

इन्द्रधनुष चाप के आकार के क्यों होते हैं? Rainbows

इन्द्रधनुष चाप के आकार के क्यों होते हैं?

सूर्य का प्रकाश सात रंगों से मिल बना है जिसे संक्षिप्त में 'बैनीआहपीनाला’ शब्द से याद रख सकते हैं  जब सूर्य की रोशनी की किरण प्रिज्म से गुजरती है तो सात रंगों में विभक्त हो जाती है। जब हम इंद्रधनुष को देखते हैं, तो वास्तव में एक विशाल और वक्राकार स्पेक्ट्रम को देख रहे होते हैं। इस स्पेक्ट्रम में बारिश की छोटी-छोटी बूंदें प्रिज्म का काम करती हैं। जब सूर्य की किरणें बूंद से गुजरती हैं तो ये सात रंगों  में विभक्त हो जाती हैं। बूंद के अंदर स्पेक्ट्रम का आकार बूंद के आकार के बराबर होता है। यहाँ कुछ प्रकाश परावर्तित होकर बूंद से हर चला जाता है। इस कारण प्रकाश की किरणे विभिन्न रंगों और विभिन्न दिशाओं में बूंद से हर निकलती हैं। इस विशेषता के कारण इंद्रधनुष तभी दिखाई देता है जब सूर्य हमारे पीछे हो और बारिश सामने हुई हो। अब इसकी धनुषनुमा आकृति पर गौर करते हैं कि यह इस रूप में ही क्यों दिखता है? उदाहरण के लिए लाल रंग लेते हैं। जो बूंदें लाल किरणों को आपकी आँखों की ओर परावर्तित करती हैं  वे सभी आपकी आँखों के साथ समान कोण बनाती हैं। अर्थात् वे सभी इस काल्पनिक क्षैतिज रेखा से बनने वाले शंकु के किनारे पर स्थित होंगी, जो आपकी आँखों के केन्द्र से गुजरती हो। अन्य रंगो के साथ भी यह होता है और इसी कारण इंद्रधनुष का आकारा चाप जैसा होता है। यहाँ एक दिलचस्प बात है कि हर व्यक्ति अपना-अलग इंद्रधनुष देखता है। इंद्रधनुष को कहीं से भी देखा जा सकता है-झरने के पास,फव्वारे के पास और यहाँ तक कि आपके शरीर के पास। बस सूर्य की किरणों को पानी की बूंदों पर चमकना चाहिए।

मंगलवार, 12 जून 2012

कुछ कीड़े प्रकाश की ओर क्यों आकर्षित होते हैं? why does light attract insects?


कुछ कीड़े प्रकाश की ओर क्यों आकर्षित होते हैं? why does light attract insects?
प्रकाश से आकर्षित होते कीट
सामान्यतः पौधे व जानवर प्रकाश की ओर आकर्षित होते हैं। 
पौधे में प्रकाशानुवर्तन और गुरुत्वानुवर्तन के गुण होते हैं 
कीटों में भी यह परिघटना प्रकाशानुवर्तन या प्रकाशानुचलन कहलाती है।
जिसमें पशु व कीड़े/कीट प्रकाश स्त्रोत की ओर गमन करते हैं।
यदि कीड़े/कीट प्रकाश की ओर जाएँ तब यह प्रवृत्ति धनात्मक प्रकाशानुचलन एवं कीड़ों का प्रकाश के दूर जाना ऋणात्मक प्रकाशानुचलन कहलाता है।
अधिकतर कीड़े धनात्मक प्रकाशानुवर्तन का गुण रखते हैं, किन्तु उनका प्रकाश के प्रति आकर्षण भिन्न-भिन्न होता है। कुछ कीड़े ऋणात्मक प्रकाशानुवर्तन का गुण रखते हैं, जैसे खटमल, यह प्रकाश से दूर भागते हैं।
प्रकाश के प्रति कीड़ों की विभिन्न प्रजातियों का भिन्न-भिन्न व्यवहार, उनके विशिष्ट लक्षणों के कारण होता है।
कुछ कीड़े बिना आँखो के भी प्रकाशानुवर्तन का गुण प्रदर्शित करते हैं।
प्रकाश के प्रति इन कीड़ों की संवेदनशीलता इनकी पृष्ठीय सतह के कारण होती हैं। उचित कीड़े प्रकाश किरणों के प्रति अत्याधिक संवेदनशील होते हैं।
उनकी सतह कोशिकाएँ व आँखे,  उनकी प्रकाश स्त्रोत के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाती हैं।
कुछ कीड़े पीले व मरकरी प्रकाश क्षेत्र के प्रति आकर्षित होते हैं।
प्रकाशमय क्षेत्र मादा द्वारा जोड़ा बनाने में भी उपयोग किया जाता है।
वयस्क  दीमक के असंख्य जोड़े प्रकाशानुवर्तन प्रकट करते हैं और मारे जाते हैं बस चंद ही जोड़ा बनाने में कामयाब होते हैं 

सोमवार, 11 जून 2012

क्या वर्षा जल शत प्रतिशत शुद्ध होता है? Is Rain Water is 100% Pure?

क्या वर्षा जल शत प्रतिशत शुद्ध होता है? Is Rain Water is 100% Pure?
आदीवासी एकत्र करते हैं वर्षा का जल
क्या वर्षा जल शत प्रतिशत शुद्ध होता है? क्या इसे हम पेय-जल के तौर पर उपयोग कर सकते हैं?
प्राकृतिक जल में आयन घुले होते हैं। 
वर्षा जल प्राकृतिक आसवन प्रक्रिया, जो कि वाष्पीकरण, संघनन एवं अवक्षेपण की सम्मिलित क्रिया है, से प्राप्त होता है, वर्षा जल बहुत ही तनु विलयन होता है। 
जिसमें बहुत ही कम मात्रा, सामान्यतः 10 से 20 मि.ग्रा. प्रति लीटर में आयन घुले रहते हैं।
वर्षा जल में सभी घुलित आयन 1 से 3 मि.ग्रा. / लीटर की परास में होते हैं। इसलिए यह शुद्ध व पेय योग्य होता है। इस वर्षा जल का पी एच मान 6.7 से 7.2 उपभोग की दृष्टि से सही माना जाता है, जो कि क्षेत्र के अनुसार परिवर्तित होता है। तटीय क्षेत्र में समुद्री फुहार के कारण आयन उच्च मात्रा में विलेय होते हैं। 

pH व T D S
हवा में अधिक कणों की उपस्थिति, पानी के अणुओं से क्रिया कर अधिक आयनों को घोलती है।
वायु में कार्बनडाइऑक्साइड, नाइट्रोजनडाइऑक्साइड एवं सल्फरडाइआक्साईड की अधिक मात्रा से अम्लीय वर्षा होती है जो कि पेड़-पौधों के लिए हानिकारक है। इस वर्षा से पी एच pH मान भी घटता है। शुद्ध वर्षा जल शरीर के लिए आवश्यक खनिज तत्वों व आयनों की पर्याप्त मात्रा नहीं रखता। इसलिए वर्षा जल में उचित परिवर्तन करने के पश्चात, पेयजल के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है।

वर्षा  का जल आरम्भिक बूंदों के साथ वातावरणीय अशुद्धियों युक्त होता है परन्तु कुछ देर की लगातार वर्षा के बाद जल अपेक्षाकृत शुद्ध अवस्था में होता है
ओधोगिक नगरी जैसे आगरा कानपुर फरीदाबाद आदि और वायु प्रदुषित शहर में वर्षा का जल अम्लीय प्रकृति का होता है   

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

क्या ? ? आने वाला है मलेरिया को रोकने वाला टीका Maliria Vaccine

क्या?? आने वाला है मलेरिया को रोकने वाला टीका Malaria Vaccine
पूरे विश्व में प्रतिवर्ष लगभग सात लाख मानव मलेरिया के कारण असमय मृत्यु को प्राप्त होते हैं इस रोग का इतिहास बताता है कि आबादी की आबादी खत्म की है इसने, इसका उपाय सर्वप्रथम डी.डी.टी.के रूप में समक्ष आया पूरी दुनिया में लाखो टन डी.डी.टी. का छिड़काव किया गया, कईं देशो में अलग से मलेरिया उन्मूलन विभाग बनाए गए लेकिन डी.डी.टी.के रूप में मिला उपाय भी मलेरिया के उन्मूलन में सफल ना हो सका वरन् डी.डी.टी. अन्य कईं पर्यावरणीय समस्याएं ले कर पेश आया मलेरिया पर दवा के विकास का इतिहास को देखा जाए तो विश्व में मलेरिया के विरूद्ध टीके विकसित किये जा रहे है यद्यपि अभी तक 100% सफलता नहीं मिली है। पहली बार प्रयास 1967 में चूहों पर किया गया था जिसे जीवित किंतु विकिरण से उपचारित बीजाणुओं का टीका दिया गया। इसकी सफलता दर 60% थी। उसके बाद से ही मानवों पर ऐसे प्रयोग करने के प्रयास चल रहे हैं। वैज्ञानिकों ने यह निर्धारण करने में सफलता प्राप्त की कि यदि किसी मनुष्य को 1000 विकिरण-उपचारित संक्रमित मच्छर काट लें तो वह सदैव के लिए मलेरिया के प्रति प्रतिरक्षा विकसित कर लेगा। इस धारणा पर वर्तमान में काम चल रहा है और अनेक प्रकार के टीके परीक्षण के भिन्न दौर में हैं। एक अन्य सोच इस दिशा में है कि शरीर का प्रतिरोधी तंत्र किसी प्रकार मलेरिया परजीवी के बीजाणु पर मौजूद सीएसपी (सर्कमस्पोरोज़ॉइट प्रोटीन) के विरूद्ध एंटीबॉडी बनाने लगे। इस सोच पर अब तक सबसे ज्यादा टीके बने तथा परीक्षित किये गये हैं। SPf66 पहला टीका था जिसका क्षेत्र परीक्षण हुआ, यह शुरू में सफल रहा किंतु बाद मे सफलता दर 30% से नीचे जाने से असफल मान लिया गया। आज RTS,S/AS02A टीका परीक्षणों में सबसे आगे के स्तर पर है। आशा की जाती है कि पी. फैल्सीपरम के जीनोम की पूरी कोडिंग मिल जाने से नयी दवाओं का तथा टीकों का विकास एवं परीक्षण करने में आसानी होगी।
मलेरिया का टीका खोजना डॉक्टरों के लिए हमेशा से ही एक बड़ी चुनौती रहा है दुनिया भर के वैज्ञानिक मलेरिया उन्मूलन का कोई कारगर उपाय खोजने में लगे रहे बहुत से रासायनिक और गैर-रासायनिक मलेरिया उन्मूलन के तरीको पर काम हुआ तब जाकर अब मलेरिया से निबटने का उपाय यानि हथियार वैज्ञानिकों के हाथ लगने वाला ही हैब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने मलेरिया रोकने का टीका लगभग विकसित कर ही लिया है इन ब्रिटिश वैज्ञानिकों को इस टीके के पूर्व परिणामों में पूर्ण सफलता मिली है यह टीका मलेरिया परजीवी की सभी प्रजातियों जैसे प्लाज्मोडियम वाईवेक्स, प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम, प्लाज्मोडियम मलेरियाई और प्लाज्मोडियम ओवेल पर कारगर होगा परन्तु अभी यह शोध प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम पर केंद्रित है। प्लाज्मोडियम फैल्सीपरम के जीनोम की पूरी कोडिंग मिल जाने से नयी दवाओं का तथा टीकों का विकास एवं परीक्षण करने में तेज़ी आयी। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के जेनर इंस्टीटयूट के डॉ़ सिमोन ड्रापर की अगुवाई में वैज्ञानिकों की एक टीम ने अब एक ऐसा टीका विकसित किया है जो शरीर में खासतौर पर प्लाज्मोडियम फाल्सिपरम को निष्क्रिय कर देता है।
मलेरिया परजीवी रक्त की लाल रक्त कणिकाओं में प्रवेश करके तीव्र गुणित होता है और फिर बीमारी को जन्म देता है। शोध दल के वैज्ञानिकों ने जो तरीका अपनाया वो था कि सर्वप्रथम उस प्रोटीन को पहचनाना जो मलेरिया परजीवी को लाल रक्त कणिकाओं तक पहुचने को आसान बनाता है। प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम परजीवी लाल रक्त कणिकाओं की सतह पर ‘बासिजिन’ नामक प्रोटीन को चुनता है और इस प्रोटीन के साथ ‘आर.एच.-5’ प्रोटीन को जोड़ देता है। इस क्रिया में लाल रक्त कणिकाओं में उसके लिए प्रवेशद्वार खुल जाता है जहां वह तीव्र गुणित होकर मलेरिया रोग को प्रकट करता है।
वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया को रोकने के तरीकों पर काम किया और सफलता मिली, ‘आर.एच.-५’ प्रोटीन के विरुद्ध एंटीबॉडीज को प्रेरित कर के इस रोग को प्रकट होने से पहले ही रोकने में सफलता प्राप्त कर ली है। ब्रिटिश वैज्ञानिकों का यह सफल शोध नेचर कम्यूनिकेशन पत्रिका में छपा है। मलेरिया का टीका 2015 तक बाजार में आ जायेगायह भरोसा अणु जीव वैज्ञानिक डॉ. जो कोहेन ने दिलाया है। 68 वर्षीय इस मृदुभाषी वैज्ञानिक के पास मलेरिया के टीके का पेटेंट है। इस पर उन्होंने इसी सप्ताह तीसरे चरण का परीक्षण पूरा कर दिया है। उनका दावा है कि इसके टीकाकरण से पांच से लेकर 17 महीने के शिशुओं में 56 फीसद तक मलेरिया की रोकथाम में सफलता मिली है। इस दवा को गंभीर बीमारी के दौरान तीन खुराक देने पर 47 प्रतिशत सफलता हासिल हुई है। इसका परीक्षण सब सहारा क्षेत्र के सात देशों में किया गया है। ये सारे परीक्षण टीके को बाजार में उतारने से पहले हो गये बताये जाते है। और इसके प्रभावों को कुछ माह के शिशुओं से लेकर बड़े बच्चों तक पर अच्छी तरह परखा जा चुका है। अगले दो से तीन साल में इंसानों पर भी इस टीके का इस्तेमाल शुरू करने की योजना है।